राजगीर, 28 अक्टूबर (आईएएनएस)। बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय में भारतीय सामाजिक विज्ञान संस्थान संघ (आईएएसएसआई) का चार दिवसीय 25वां वार्षिक सम्मेलन बुधवार को संपन्न हो गया। सम्मेलन के समापन सत्र में बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन ने साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण, सार्वजनिक विश्वास, आपदा-सहनीयता और मानव-केंद्रित शासन में सामाजिक विज्ञान की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
उन्होंने कहा कि सामाजिक विज्ञान अनुसंधान का वास्तविक उद्देश्य लोगों को बेहतर ढंग से समझना और उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना है। समापन सत्र में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष प्रोफेसर एस. महेंद्र देव, नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति और आईएएसएसआई के अध्यक्ष प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी तथा इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट, नई दिल्ली के निदेशक प्रोफेसर अलख एन. शर्मा ने भी विचार व्यक्त किए। सम्मेलन में देशभर के विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के विद्वानों, शोधकर्ताओं तथा नीति-निर्माताओं ने विकास और सार्वजनिक नीति से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की।
राज्यपाल सैयद अता हसनैन ने अपने संबोधन में सैन्य सेवा और आपदा प्रबंधन के अनुभवों का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्थाओं की प्रभावशीलता केवल संसाधनों और परिचालन क्षमता पर निर्भर नहीं करती, बल्कि लोगों की चिंताओं, आकांक्षाओं और रोजमर्रा की परिस्थितियों को समझना भी जरूरी है। उन्होंने सामाजिक समझ, सार्वजनिक विश्वास और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संबंधों को रेखांकित किया। बिहार की विकास संबंधी चुनौतियों पर चर्चा करते हुए राज्यपाल ने उत्तर बिहार में बार-बार आने वाली बाढ़ का उदाहरण दिया।
उन्होंने कहा कि आपदा की तैयारी केवल इंजीनियरिंग और पूर्वानुमान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसमें स्थानीय ज्ञान, सामुदायिक व्यवहार, आजीविका संरक्षण और विस्थापन के दीर्घकालिक प्रभावों को भी शामिल करना आवश्यक है। इसके लिए सामाजिक वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच समन्वय तथा प्रभावित समुदायों की भागीदारी जरूरी है। उन्होंने बिहार के विश्वविद्यालयों में अनुसंधान क्षमता मजबूत करने, युवा शोधकर्ताओं को बेहतर मार्गदर्शन देने और शोध निष्कर्षों को हिंदी सहित अन्य प्रासंगिक भाषाओं में आम लोगों तक पहुंचाने पर जोर दिया।
उन्होंने डिजिटल पहुंच और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जिम्मेदार उपयोग जैसी समकालीन चुनौतियों के समाधान में संवाद और प्रमाण-आधारित दृष्टिकोण को महत्वपूर्ण बताया। प्रोफेसर एस. महेंद्र देव ने कहा कि समावेशी और सतत विकास 2030 के बाद भी वैश्विक एजेंडे का प्रमुख हिस्सा रहेगा। भारत अपने आंकड़ों, नीतिगत अनुभव और विकास पहलों के माध्यम से इसमें महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। उन्होंने आईएएसएसआई से संस्थागत विस्तार और शैक्षणिक सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया। वहीं, प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि विकास को केवल भौतिक प्रगति तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसमें संस्कृति, सामाजिक संबंध, मूल्य और मानव कल्याण भी शामिल हैं।
प्रोफेसर अलख एन. शर्मा ने जटिल सामाजिक चुनौतियों के समाधान के लिए विभिन्न विषयों के शोधकर्ताओं के बीच सहयोग बढ़ाने की जरूरत बताई। सम्मेलन में शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, संस्कृति, सार्वजनिक नीति, सामाजिक परिवर्तन और डिजिटल प्रौद्योगिकी के सामाजिक एवं नैतिक प्रभावों पर भी विचार-विमर्श हुआ। प्रतिभागियों ने साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण और अंतर्विषयक अनुसंधान को समावेशी तथा सतत विकास के लिए आवश्यक बताया।
