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दिल्ली प्रदूषण : पर्यावरणविद् भावरीन कंधारी की सलाह, ‘रोकथाम के प्रयास पूरे साल चलने चाहिए’

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नई दिल्ली, 28 अक्टूबर (आईएएनएस)। दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण की स्थिति को देखते हुए ग्रैप (ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान) लागू किया गया है। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् भावरीन कंधारी ने दिल्ली में प्रदूषण के बढ़ते स्तर और एक्यूआई (वायु गुणवत्ता सूचकांक) को लेकर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने बुधवार को आईएएनएस को बताया कि यह एक्शन प्लान हर साल आता है। इस साल समय से पहले इसके बारे में बात हुई और समय से पहले इसे शुरू कर दिया गया।

दरअसल, प्रदूषण को लेकर दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा काफी सक्रिय हैं। वे ‘विंटर एक्शन प्लान’ की बात कर रहे हैं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में भी ऐसी बातें होती रही हैं, लेकिन इस बार इसे एक अलग नजरिए से देखा जा रहा है। इसमें और भी सख्त नियमों की बात हो रही है, लेकिन अब असली सवाल यह है कि इसे लागू कैसे किया जाएगा? इसका क्रियान्वयन कैसे होगा?

इसे लेकर पर्यावरणविद् भावरीन कंधारी ने कहा कि अगर आपके पास पर्याप्त लोग ही नहीं हैं, तो काम कैसे चलेगा? मान लीजिए, अगर आप बॉर्डर पर गाड़ियों को रोकते हैं, तो वहां लाखों गाड़ियां रुक जाएंगी। आपके पास न तो जांच करने के लिए पर्याप्त लोग हैं और न ही उन्हें कोई विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। क्या आपके पास निर्माण कार्यों में नियमों के उल्लंघन को रोकने के लिए कोई ‘क्विक रिएक्शन टीम’ है? क्योंकि जब हम शिकायत दर्ज कराते हैं, तो उसमें बहुत लंबा समय लग जाता है।

उन्होंने कहा कि शिकायत करने और कार्रवाई होने के बीच के इस लंबे अंतराल में प्रदूषण रुकता नहीं है, बल्कि जारी रहता है। इसलिए, इस तरह के कदम उठाने की जरूरत है। हालांकि, नियमों को सख्ती से लागू करना सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। अगर सरकार की मंशा साफ है और वह सक्रिय है, तो उसे सख्ती को एक व्यवस्थित कार्य योजना के साथ जोड़ना होगा। यह काम पूरे साल चलना चाहिए। स्थानीय स्तर पर होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए एक मिशन की तरह काम करना होगा, ताकि भौगोलिक परिस्थितियों के कारण जो प्रदूषण बढ़ता है, उसे काफी हद तक कम किया जा सके।

उन्होंने कहा कि मौजूदा स्थिति में, अगर आप पटाखे जलाते हैं, कचरे के ढेरों में आग लगाते हैं या औद्योगिक प्रदूषण बढ़ाते हैं, तो शहर में प्रदूषण का स्तर और भी खतरनाक हो जाएगा। यह एक बड़ी आपदा साबित हो सकती है। पटाखों का इसमें कोई सकारात्मक योगदान नहीं है और न ही इनका किसी धार्मिक भावना से कोई लेना-देना है। मुझे समझ नहीं आता कि लोग पटाखों को धार्मिक भावना से कैसे जोड़ते हैं। यह बस एक जश्न या उत्साह का मौका हो सकता है, लेकिन आजकल स्कूलों में चलाए जा रहे जागरूकता अभियानों की वजह से, बच्चे भी अब पटाखों से दूर रहना सीख रहे हैं। हमें इस बात को समझना चाहिए कि अभी हम एक ऐसे ‘प्रदूषण से भरे कंटेनर’ की तरह हैं, जिसका ढक्कन ऊपर से बंद है।

उनके मुताबिक, अभी प्रदूषण से बचने का कोई रास्ता नहीं है। आने वाले कुछ हफ्तों में तापमान और भी गिरेगा, ऐसे में इतनी बड़ी गलती कैसे की जा सकती है? हमने देखा है कि कैसे एक ही शाम में प्रदूषण का स्तर अचानक बढ़ जाता है और हमें उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। यह सिर्फ एक रात या एक दिन की बात नहीं है। प्रदूषण के कण हफ्तों और महीनों तक हवा में बने रहते हैं। इसके अलावा, कानून भी इस बारे में बिल्कुल स्पष्ट हैं। इसलिए, बात सिर्फ दीपावली की नहीं है। क्रिसमस, दशहरा, गुरुपर्व, राजनीतिक रैलियों या क्रिकेट मैचों में पटाखे जलाने से प्रदूषण बढ़ता है। इसलिए, ऐसा करना बिल्कुल भी सही नहीं है।