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पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में बढ़ते विरोध प्रदर्शनों ने पाकिस्तान के प्रशासनिक मॉडल पर खड़े किए सवाल

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नई दिल्ली, 6 नवंबर (आईएएनएस)। बिजली दरों में बढ़ोतरी, गेहूं की ऊंची कीमतों और प्रशासनिक विफलताओं के खिलाफ शुरू हुए विरोध प्रदर्शन अब पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) और गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तान की शासन व्यवस्था को चुनौती देने वाले एक बड़े आंदोलन का रूप ले चुके हैं। इन घटनाओं ने उन राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं को सामने ला दिया है, जिन्हें इस्लामाबाद लंबे समय से छिपाने की कोशिश करता रहा है।

इन प्रदर्शनों ने गहरी राजनीतिक असंतुष्टि, आर्थिक परेशानियों और जवाबदेही की बढ़ती मांगों को उजागर किया है, जो पाकिस्तान के नियंत्रण वाले इन क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही हैं।

हाल के वर्षों में पीओके में जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेकेजेएएसी) जैसे नागरिक संगठनों के नेतृत्व में कई बार बड़े पैमाने पर आंदोलन हुए हैं।

स्थानीय लोगों ने महंगाई, बढ़ती लागत, जरूरी सामानों की कमी और इस्लामाबाद द्वारा क्षेत्र की लगातार उपेक्षा किए जाने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किए हैं। ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान के जांचकर्ताओं ने भी पाया कि 2024 के बड़े विरोध प्रदर्शनों के पीछे सस्ती बिजली और आटे की मांग, अधिक जवाबदेही तथा राजनीतिक नेताओं और नौकरशाहों को मिलने वाली विशेष सुविधाओं का विरोध प्रमुख कारण थे।

स्थानीय लोगों की नाराजगी सिर्फ स्थानीय प्रशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक व्यवस्था से भी जुड़ी है जिसके जरिए पाकिस्तान इन क्षेत्रों का शासन चलाता है।

आलोचकों का कहना है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संसाधनों के प्रबंधन और सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण फैसलों पर अब भी इस्लामाबाद का गहरा प्रभाव बना रहता है, जिससे स्थानीय स्वायत्तता सीमित हो जाती है।

मौजूदा संकट का आर्थिक पहलू पाकिस्तान के लिए और अधिक चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। प्रदर्शनकारी अक्सर यह सवाल उठाते हैं कि पीओके बड़ी मात्रा में जलविद्युत (हाइड्रोपावर) पैदा करता है, फिर भी वहां के लोगों को महंगी बिजली और अनियमित सेवाओं का सामना क्यों करना पड़ता है।

कम बिजली दरों की मांग के साथ-साथ गेहूं पर सब्सिडी और स्थानीय संसाधनों से होने वाली आय में उचित हिस्सेदारी की मांग भी विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख मुद्दा बन चुकी है।

हालांकि इन मांगों पर समाधान खोजने के बजाय अधिकारियों पर सख्ती बढ़ाने के आरोप लगे हैं। कई रिपोर्टों में संचार सेवाएं बंद किए जाने, बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां होने, सुरक्षा बलों की तैनाती और हिंसक झड़पों का जिक्र किया गया है।

2025 और 2026 के दौरान भी अशांति जारी रही, जिसमें कई लोगों की मौत और घायल होने की खबरें सामने आईं। इससे जनता की अपेक्षाओं और सरकारी प्रतिक्रिया के बीच बढ़ती दूरी साफ दिखाई देती है।

एक अन्य विवादास्पद मुद्दा उन लोगों के लिए विधानसभा सीटों का आरक्षण है जिन्हें “जम्मू-कश्मीर के शरणार्थी” बताया जाता है और जो पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में रहते हैं। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि ये आरक्षित सीटें क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को प्रभावित करती हैं और इस्लामाबाद को राजनीतिक नतीजों पर प्रभाव बनाए रखने में मदद करती हैं।

यह विवाद अब लोकतांत्रिक वैधता और स्वशासन के व्यापक सवाल का रूप ले चुका है। इसी तरह की चिंताएं गिलगित-बाल्टिस्तान में भी सामने आ रही हैं, जहां लोग लगातार संवैधानिक दर्जे, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, कर व्यवस्था और स्थानीय संसाधनों के दोहन जैसे मुद्दे उठा रहे हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि रणनीतिक महत्व और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद इस क्षेत्र के लोग अधिक स्वायत्तता और निर्णय लेने की प्रक्रिया में सार्थक भागीदारी की मांग कर रहे हैं। इन घटनाओं ने पाकिस्तान के सामने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है। यदि इस्लामाबाद अपने प्रशासनिक नियंत्रण वाले क्षेत्रों का प्रभावी ढंग से प्रबंधन नहीं कर पा रहा, तो जम्मू-कश्मीर के व्यापक मुद्दे पर उसके दावों की विश्वसनीयता कितनी मजबूत है?

रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान अक्सर भारत से जुड़े कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाता रहा है, लेकिन उसके नियंत्रण वाले क्षेत्रों में बढ़ते विरोध प्रदर्शन घरेलू शासन व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर रहे हैं। नियंत्रण रेखा के पार होने वाले घटनाक्रमों पर ध्यान केंद्रित करने के साथ-साथ अब पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान के भीतर भी बड़ी संख्या में लोग अपनी राजनीतिक व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं और स्थानीय समस्याओं के समाधान की मांग कर रहे हैं।

स्थानीय संस्थाओं पर संघीय सरकार के गहरे प्रभाव के आरोपों ने लोकतांत्रिक कमी की धारणा को और मजबूत किया है। बार-बार होने वाले विरोध प्रदर्शन यह संकेत देते हैं कि शासन व्यवस्था से जुड़ी समस्याएं केवल बल प्रयोग या सख्ती से लंबे समय तक नियंत्रित नहीं की जा सकतीं।

अंततः, पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान की मौजूदा स्थिति एक बड़े विरोधाभास को सामने लाती है। एक ओर पाकिस्तान खुद को कश्मीरियों की आकांक्षाओं का समर्थक बताता है, वहीं दूसरी ओर उसके नियंत्रण वाले क्षेत्रों के निवासियों की ओर से ही उसकी नीतियों और शासन को लेकर आलोचनाएं बढ़ रही हैं।

लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शन, कथित राजनीतिक हस्तक्षेप, सुरक्षा बलों की कार्रवाई और संसाधनों के बंटवारे को लेकर विवाद यह संकेत देते हैं कि पाकिस्तान की सबसे बड़ी चुनौती नियंत्रण रेखा के पार नहीं, बल्कि उसके अपने प्रशासनिक नियंत्रण वाले क्षेत्रों के भीतर मौजूद है।