मुंबई, 16 जनवरी (आईएएनएस)। शकुंतला परांजपे का नाम भारतीय साहित्य, फिल्म और समाज सेवा में हमेशा याद किया जाएगा। उनकी जिंदगी में कई ऐसे रंग और आयाम थे जो उन्हें सामान्य से अलग बनाते थे। उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में गणित से पढ़ाई की, फिर फिल्मों में अभिनय किया, नाटक और उपन्यास लिखे, और समाज के लिए भी महत्वपूर्ण काम किए। फिल्मों की दुनिया में उनकी बहुमुखी प्रतिभा ने दर्शकों को हमेशा चौंकाया।
शकुंतला का जन्म 17 जनवरी 1906 को हुआ था। वह महान गणितज्ञ और कूटनीतिज्ञ सर आर. पी. परांजपे की बेटी थीं। उन्होंने अपने पिता से ही शिक्षा और अनुशासन की सीख ली। उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से गणित में स्नातक की डिग्री प्राप्त की और उसके बाद लंदन विश्वविद्यालय से शिक्षा में डिप्लोमा हासिल किया।
उनकी जीवन यात्रा गणित तक सीमित नहीं रही। 1930 के दशक में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के साथ स्विट्जरलैंड के जिनेवा में काम किया। वहीं से उनका सामाजिक दृष्टिकोण और जागरूकता विकसित हुई। इसी समय उन्होंने फिल्मों और थिएटर में भी कदम रखा। मराठी और हिंदी फिल्मों में उनके अभिनय ने दर्शकों को प्रभावित किया। उनके अभिनय की खासियत यह थी कि वह हर किरदार को अपने अंदाज और भावों से जीवंत कर देती थीं।
उनकी फिल्मों की दुनिया में बहुमुखी प्रतिभा का एक उदाहरण ‘दुनिया ना माने’ है। यह फिल्म 1937 में बनी और सामाजिक मुद्दों पर आधारित थी। इसके अलावा ‘बहादुर बेटी’ और ‘टाइपिस्ट गर्ल’ जैसी फिल्में दर्शकों को उनके अभिनय के अलग-अलग रंग दिखाती थीं। उनकी फिल्में मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश से भरपूर थी। उनके अभिनय और चयनित किरदार आज भी सिनेमा के इतिहास में याद किए जाते हैं।
साहित्य में भी उनका योगदान कम नहीं था। उन्होंने मराठी और अंग्रेजी में कई नाटक, लघु कथाएं और उपन्यास लिखे। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘थ्री इयर्स इन ऑस्ट्रेलिया’, ‘सेंस एंड नॉनसेंस’, और ‘काही आंबट, काही गोड’ शामिल हैं। लेखन के जरिए उन्होंने समाज के विभिन्न पहलुओं, बच्चों की कहानियों और पारिवारिक जीवन को सुंदर तरीके से पेश किया।
शकुंतला परांजपे ने समाज सेवा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने परिवार नियोजन और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में शानदार काम किया। उनके योगदान के लिए उन्हें 1991 में ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया, जो भारत का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है।
शकुंतला परांजपे का निधन 3 मई 2000 को हुआ, लेकिन उनकी यादें, फिल्में और साहित्य आज भी जीवित हैं।

