बांग्लादेश चुनाव में सात महिला उम्मीदवारों ने दर्ज की जीत, राजनीति में महिलाओं की भागीदारी रहा अहम मुद्दा

0
8

नई दिल्ली, 13 फरवरी (आईएएनएस)। बांग्लादेश में गुरुवार को हुए 13वें संसदीय चुनाव में द डेली स्टार की ओर से साझा जानकारी के अनुसार, अब तक 284 सीटों पर वोटों की गिनती पूरी हो चुकी है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और गठबंधन ने 208 सीटों पर जीत दर्ज की है। बांग्लादेश के चुनाव में इस साल महिलाओं की राजनीति में भागीदारी एक अहम मुद्दा रहा।

चुनाव आयोग की तरफ से साझा जानकारी के अनुसार बांग्लादेश के इस चुनाव में कुल महिला उम्मीदवारों की संख्या पुरुष कैंडिडेट्स की तुलना में ना के बराबर रही। ऊपर से जमात-ए-इस्लामी की ओर से राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को लेकर की गई टिप्पणी ने इस मामले को और हवा दे दी।

हालांकि, अनौपचारिक नतीजों के मुताबिक 13वें नेशनल इलेक्शन में सात महिला उम्मीदवार संसद के लिए चुनी गई हैं। अब तक के नतीजों के हिसाब से बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी बढ़त के साथ आगे है। बीएनपी बांग्लादेश में इस बार बहुमत के साथ सरकार बनाने वाली है; उसकी छह महिला उम्मीदवारों ने अपनी-अपनी सीटों पर जीत दर्ज की है।

चुनी गई महिला उम्मीदवारों में मानिकगंज-3 से अफरोजा खान रीता, झालोकाटी-2 से इसरत सुल्ताना एलेन भुट्टो, सिलहट-2 से तहसीना रुशदिर लूना, फरीदपुर-2 से शमा ओबैद, फरीदपुर-3 से नायाब यूसुफ कमाल और नटोरे-1 से फरजाना शर्मिन पुतुल शामिल हैं।

इसके अलावा, बैरिस्टर रूमिन फरहाना ब्राह्मणबरिया-2 से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनी गई हैं। उन्हें पहले बीएनपी से निकाल दिया गया था।

चुनावी अभियान और वोटिंग के दौरान महिला उम्मीदवारों ने बताया कि उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। महिला उम्मीदवारों का चरित्र हनन किया गया और, उनपर साइबर हमले हुए और धमकियां भी मिलीं। हालांकि, बीएनपी का रुख साफ था कि महिलाओं की भागीदारी और विकास के बिना देश का विकास संभव नहीं है।

बांग्लादेश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी पर सवाल उठाने का मतलब है कि देश के राजनीतिक इतिहास पर प्रश्न चिन्ह लगाना। बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास में दो महिलाओं का नाम इतना अहम है। वो दो नाम पूर्व पीएम और बीएनपी की पूर्व अध्यक्ष दिवंगत खालिदा जिया और बांग्लादेश की पूर्व पीएम शेख हसीना का है। इन दो महिलाओं ने बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था, विकास और राजनीति को आकार दिया है।

लंबे समय के लिए दोनों महिलाओं के हाथ में देश की कमान रही है। जमात ने महिलाओं की भूमिका को नकारने और इस संबंध में एजेंडा सेट करने की कोशिश तो पूरी की, लेकिन जनता ने उनके इस एजेंडे को नकार दिया।

चुनावी अभियान के दौरान जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख शफीकुर्रहमान ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा किया था, जिसे कड़ी आलोचनाओं के बाद उन्होंने हटा लिया। इस पोस्ट में दावा किया गया था कि जब आधुनिकता के नाम पर महिलाओं को घर से बाहर निकाला जाता है, तो उन्हें शोषण, नैतिक गिरावट और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है, इसे वेश्यावृत्ति का एक और रूप बताया गया। पोस्ट के स्क्रीनशॉट हटाए जाने से पहले तेजी से ऑनलाइन वायरल हो गए।

इस टिप्पणी की बहुत निंदा हुई क्योंकि इसमें शिक्षा, काम और लीडरशिप में महिलाओं की भागीदारी को नैतिक रूप से भ्रष्ट करने वाला बताया गया था और समाज में महिलाओं की भूमिका पर बहुत पिछड़े विचारों को दिखाया गया था।

कड़ी आलोचनाओं के बाद पार्टी ने अकाउंट हैक होने का बहाना दिया और कहा कि यह जमात-ए-इस्लामी की विचारधारा नहीं है। हालांकि, जमात के इस बयान ने देश में महिलाओं की भागीदारी को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी।