बंगाल चुनाव 2026: जनवरी 2024 हिंसा के बाद बदला माहौल, संदेशखाली सीट पर सबकी नजरें

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कोलकाता, 19 फरवरी (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की आहट तेज होती जा रही है और इसी के साथ कुछ सीटें राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई हैं। नॉर्थ 24 परगना जिले की संदेशखाली विधानसभा सीट ऐसी ही एक सीट है, जो अपने राजनीतिक इतिहास, सामाजिक संरचना और हालिया घटनाक्रमों की वजह से इस बार खास तौर पर सुर्खियों में है।

संदेशखाली बशीरहाट लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली एक अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित विधानसभा सीट है। आजादी के बाद 1951 में इसका गठन एक सामान्य सीट के रूप में हुआ था और तब से लेकर अब तक यह हर विधानसभा चुनाव का हिस्सा रही है। वर्ष 2008 में परिसीमन आयोग के आदेश के बाद 2011 से यह सीट अनुसूचित जनजाति समुदाय के लिए आरक्षित कर दी गई। मौजूदा स्वरूप में इसमें संदेशखाली-I कम्युनिटी डेवलपमेंट ब्लॉक और संदेशखाली-II ब्लॉक की सात ग्राम पंचायतें शामिल हैं।

भौगोलिक रूप से संदेशखाली सुंदरबन डेल्टा क्षेत्र में स्थित है। यह इलाका नदियों, खाड़ियों और ज्वार-भाटे वाले जलमार्गों से घिरा है। रायमंगल और विद्याधरी जैसी नदियां यहां के जीवन और आजीविका का अहम हिस्सा हैं। खेती और मछली पालन स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, हालांकि बाढ़, तटबंधों में दरार और खारे पानी की घुसपैठ जैसी समस्याएं यहां के लोगों के लिए हमेशा चिंता का विषय बनी रहती हैं।

राजनीतिक तौर पर संदेशखाली ने दशकों तक वामपंथी राजनीति का मजबूत गढ़ देखा है। यहां माकपा सबसे सफल पार्टी रही है, जिसने कुल 10 बार इस सीट पर जीत दर्ज की और 1977 से 2011 तक लगातार आठ चुनावों में कब्जा बनाए रखा। कांग्रेस भी शुरुआती दौर में यहां प्रभावी रही और चार बार जीत हासिल कर चुकी है।

हालांकि 2016 में इस परिदृश्य में बड़ा बदलाव आया, जब तृणमूल कांग्रेस ने वाम मोर्चे के लंबे वर्चस्व को तोड़ा। तृणमूल के उम्मीदवार सुकुमार महाता ने माकपा के मौजूदा विधायक को बड़े अंतर से हराया और 2021 में भी अपनी सीट बरकरार रखी। दूसरी ओर, भाजपा ने पिछले एक दशक में यहां धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत की है। 2011 और 2016 में सीमित वोट शेयर से आगे बढ़ते हुए 2021 में पार्टी दूसरे नंबर पर पहुंच गई। हालिया लोकसभा चुनाव में तो भाजपा ने इस विधानसभा क्षेत्र में बढ़त भी बना ली, जिससे मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।

संदेशखाली पूरी तरह ग्रामीण क्षेत्र है और यहां कोई शहरी मतदाता नहीं है। 2024 तक यहां करीब ढाई लाख पंजीकृत मतदाता थे, जिनकी संख्या हर चुनाव के साथ बढ़ी है। सामाजिक संरचना की बात करें तो सबसे बड़ा वोटर समूह अनुसूचित जाति का है, इसके बाद अनुसूचित जनजाति और मुस्लिम मतदाता आते हैं।

मतदान प्रतिशत हमेशा से ऊंचा रहा है, हालांकि हाल के वर्षों में इसमें हल्की गिरावट देखी गई है। फिर भी, यह सीट राज्य के उन इलाकों में गिनी जाती है जहां मतदाता चुनाव को गंभीरता से लेते हैं और बड़ी संख्या में मतदान करते हैं।

कागजी आंकड़ों में देखें तो तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच यहां मुकाबला लगभग बराबरी का नजर आता है, लेकिन जनवरी 2024 की हिंसक घटनाओं ने राजनीतिक माहौल को बदल दिया है। प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के दौरान हुई हिंसा, स्थानीय नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार और गंभीर आपराधिक आरोपों ने सत्तारूढ़ पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया है। इन घटनाओं की वजह से इलाके में नाराजगी का माहौल बना, जिसका असर आने वाले चुनावों में दिख सकता है।

विश्लेषकों का मानना है कि इस असंतोष का सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है, खासकर तब जब पार्टी देशभर में अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों के बीच अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रही है। वाम मोर्चा और कांग्रेस गठबंधन की स्थिति फिलहाल कमजोर मानी जा रही है, लेकिन वे भी इस समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं।

कुल मिलाकर, संदेशखाली सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दों का ऐसा संगम बन चुकी है, जहां 2026 के चुनाव में मतदाता सिर्फ उम्मीदवार नहीं, बल्कि बीते वर्षों की राजनीति और हालिया घटनाओं पर भी फैसला सुनाने वाले हैं।