बंगाल के वे क्रांतिकारी जिन्होंने कभी ‘दया याचिका’ नहीं लिखी, उन्हें भुला दिया गया: ऋताब्रत बनर्जी

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नई दिल्ली, 11 फरवरी (आईएएनएस)। तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य ऋताब्रत बनर्जी ने बुधवार को जीरो आवर के दौरान पश्चिम बंगाल के 12 निडर स्वतंत्रता सेनानियों की अनदेखी की गई विरासत पर ध्यान दिलाया। ये सेनानी 1908-1909 के ऐतिहासिक अलीपुर बम केस (जिसे अलीपुर कॉन्सपिरेसी केस भी कहा जाता है) के बाद अंडमान द्वीप समूह की सेलुलर जेल में भेजे गए थे।

ऋताब्रत बनर्जी ने अपने भाषण में क्रांतिकारियों बरिंद्रकुमार घोष (बरिन घोष), उल्लासकर दत्त और हेम चंद्र कानूनगो (हेमचंद्र दास कानूनगो) का उदाहरण दिया। ये वे लोग थे, जिन्हें ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को चुनौती देने वाली क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए ट्रायल के बाद उम्रकैद की सजा दी गई और देश निकाला दिया गया।

बनर्जी ने कहा, “ये वे लोग थे जिन्होंने बिना किसी समझौते के ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ लड़ाई लड़ी।”

बरिंद्रकुमार घोष ने युगांतर और अनुशीलन समिति आंदोलनों के हिस्से के रूप में पश्चिम बंगाल में बम बनाने वाली यूनिट और एक अंडरग्राउंड नेटवर्क तैयार किया था। उल्लासकर दत्त समूह के मुख्य बम बनाने वाले थे, जबकि हेम चंद्र कानूनगो पेरिस से एक्सप्लोसिव और क्रांतिकारी संगठन की विशेषज्ञता लेकर लौटे थे।

सांसद ने कहा कि ये 12 क्रांतिकारी, जिनमें ये तीन प्रमुख नेता भी शामिल थे, सालों तक सेलुलर जेल में बेरहमी सहते रहे। जेल में उन्हें कठोर अकेलापन, कड़ी मेहनत जैसे तेल निकालने का काम और इंसानियत से दूर हालात का सामना करना पड़ा। यही वजह है कि इस जेल को ‘काला पानी’ के नाम से जाना जाता है। इसके बावजूद ये क्रांतिकारी डटे रहे और अपनी लड़ाई जारी रखी।

बनर्जी ने कहा कि इन निडर क्रांतिकारियों को आसानी से भुला दिया गया और उनके इरादों की तुलना उन लोगों से की, जिन्होंने दया की मांग की थी। उन्होंने जोर देकर कहा, “इन क्रांतिकारियों ने कभी कोई मर्सी पिटीशन नहीं लिखी।” बनर्जी ने कहा कि भारत की आजादी की लड़ाई के प्रति उनके पक्के कमिटमेंट के लिए उन्हें सही सम्मान और पहचान मिलनी चाहिए।

अलीपुर केस, जिसकी सुनवाई 1908-1909 में कलकत्ता के सेशंस कोर्ट में हुई, में बम बनाने और हत्या की कोशिश के बाद ब्रिटिश शासन के खिलाफ जंग छेड़ने के आरोप थे। इसमें मुजफ्फरपुर में एक ब्रिटिश मजिस्ट्रेट को निशाना बनाकर किया गया बम धमाका भी शामिल था।

इस केस में श्री अरबिंदो जैसे कुछ लोगों को बरी कर दिया गया, जबकि बरिंद्रकुमार घोष और उल्लासकर दत्त को शुरू में मौत की सजा सुनाई गई, जिसे बाद में उम्रकैद में बदल दिया गया। बाकी क्रांतिकारियों को भी उम्रकैद की सजा मिली।

बनर्जी की यह टिप्पणी बंगाल के क्रांतिकारी योगदान को पहचान देने पर चल रही बहस के बीच आई। उन्होंने बताया कि सेलुलर जेल में शुरुआती कैदियों में लगभग 46 बंगाली शामिल थे (1909-1921 के शुरुआती समूह में)। उन्होंने संसद और देश से अपील की कि इन ‘बिना किसी समझौते के’ लोगों को उनका हकदार सम्मान दिया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि भारत की आजादी की कहानी में उनके बलिदान को हमेशा याद रखा जाए।