भूसेंदेश्वर मंदिर के विकास के लिए मिली 10 करोड़ की मदद, सांसद प्रताप सारंगी ने जताया सरकार का आभार

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बालासोर, 16 फरवरी (आईएएनएस)। 15 फरवरी को देश भर में मनाई गई शिवरात्रि को लेकर हर शिवालय और ज्योतिर्लिंग में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिली।

भक्त अपने आराध्य के जयकारे लगाकर मनोकामना पूर्ति के लिए लंबी-लंबी कतारों में लगे दिखे। ओड़िसा के बालासोर जिले के भोगराई में शिवरात्रि का अनोखा जश्न देखने को मिला, जहां एशिया के सबसे बड़े शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए भक्तों ने घंटों इंतजार किया और एक लाख दीये जलाए।

ओड़िसा के बाबा भूसेंदेश्वर मंदिर की बहुत मान्यता है, और दावा किया जाता है कि यह एशिया के सबसे बड़े शिवलिंग हैं। काले ग्रेनाइट पत्थर से बने बाबा भूसेंदेश्वर मंदिर के प्रांगण में जमीन की गहराई से जुड़े हुए हैं। कोई नहीं जानता कि जमीन के नीचे उनका असल आकार कैसा है। शिवरात्रि के मौके पर बाबा भुसंडेश्वर के लिए कमेटी और भक्तों की तरफ से एक लाख दीये जलाए गए हैं। बालासोर के सांसद प्रताप सारंगी ने शिवरात्रि के मौके पर बाबा भुसंडेश्वर के दर्शन किए और सभी को धन्यवाद व शुभकामनाएं दीं।

उन्होंने कहा कि बाबा भुसंडेश्वर सभी की आस्था का केंद्र है। महाशिवरात्रि के मौके पर मंदिर में लाखों लोग दर्शन के लिए आए हैं। यहां के लोगों और कमेटी ने पूरी श्रद्धा से एक लाख दीये जलाकर बाबा की शादी का उत्सव मनाया है। उन्होंने आगे कहा, “राज्य सरकार ने भुसंडेश्वर मंदिर के विकास के लिए मुख्यमंत्री को लिखकर बताया है कि 10 करोड़ रुपये की एडवांस मदद मिल गई है और विकास के काम के लिए 30 करोड़ रुपये का डीआरपी तैयार हो गया है। सरकार की तरफ से आश्वासन मिला है कि मंदिर के विकास का काम पूरा किया जाएगा और मदद के लिए पैसा भी मिलेगा।

बाबा भूसेंदेश्वर मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों के बीच कई तरह की मान्यताएं हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि यह शिवलिंग प्रति वर्ष 2 इंच बढ़ रहा है। ऐसा माना जाता है कि यहां की गई कोई भी मनोकामना बाबा जटाधारी की कृपा से पूरी होती है। पौराणिक कथाओं में भी भूसेंदेश्वर महादेव की महिमा का बखान किया गया है। माना जाता है कि रावण की वजह से शिवलिंग की स्थापना इस स्थान पर हुई थी।

यह शिवलिंग भगवान के एक बड़े भक्त ने रावण को भेंट किया था लेकिन ये भी चेताया था कि इसे जमीन पर रखें। अपनी यात्रा के दौरान रावण भोगराई में रुका और शिवलिंग को जमीन पर रख दिया। माना जाता है कि जमीन को छूते ही शिवलिंग ने भोगराई को ही अपना स्थान बना लिया और वहीं स्थापित हो गया।