देश का एकमात्र मंदिर जहां पिंडी रूप में विराजमान हैं शनि देव, देते हैं हर पीड़ा से मुक्ति

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नई दिल्ली, 1 मार्च (आईएएनएस)। काशी के बाद उज्जैन ही ऐसा स्थान है, जहां जाने से केवल भगवान शिव की कृपा ही प्राप्त नहीं होती, बल्कि मां भगवती और शनि देव का आशीर्वाद भी मिलता है।

बहुत कम लोग जानते हैं कि बाबा उज्जैन की धरती पर ऐसा शनि मंदिर मौजूद है, जहां शनि देव पिंडी के रूप में विराजमान हैं और उनकी प्रतिमा का रंग काला नहीं, बल्कि भगवा है। मंदिर की मान्यता इतनी पुरानी है कि भक्त अपने सारे कष्टों से मुक्ति पाने के लिए मंदिर में दर्शन के लिए जरूर आते हैं।

शिप्रा नदी के पास त्रिवेणी घाट के किनारे 2000 साल पुराना नवग्रह शनि मंदिर स्थापित है, जहां शनिदेव और नवग्रह दोनों का आशीर्वाद मिलता है। माना जाता है कि मंदिर में दर्शन करने से बड़ी से बड़ी समस्या का हल मिलता है। अगर नवग्रह असंतुलित हैं, तो यहां अनुष्ठान मात्र से सारी पीड़ा का अंत हो जाता है। शनिवार को पड़ने वाली अमावस्या के दिन मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, अगर भक्त किसी कष्ट से गुजर रहे हैं, तो वह मंदिर में ही चप्पल और वस्त्र छोड़ आते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से शारीरिक और मानसिक परेशानी से निजात मिलती है।

मंदिर में कई ऐसी अलग चीजें देखने को मिलती हैं, जो बाकी मंदिरों में देखने को नहीं मिलती। मंदिर में शनिदेव की मूर्ति काली नहीं, बल्कि भगवा रंग की है, जो देखने में हनुमान जी की प्रतिमा लगती है। वहीं मंदिर के मुख्य गर्भगृह में शनिदेव पिंडी रूप में विराजमान हैं और उन पर निरंतर तेल टपकता रहता है। शनिदेव के इस रूप को भगवान शिव का ही अवतार माना जाता है। कहा जाता है कि यह विश्व का पहला मंदिर है, जहां शनिदेव बाबा के रूप में विराजमान हैं।

नवग्रह शनि मंदिर में दशा पूजन का बहुत महत्व है और भक्त देश के कोने-कोने से इस पूजन को कराने के लिए आते हैं। माना जाता है कि अगर किसी पर शनि की साढ़े साती या ढैय्या चल रही है, तो दशा पूजन बहुत लाभ देता है। इससे शनि देव की वक्र दृष्टि का प्रभाव कम होता है।

मंदिर के इतिहास और बनाव की बात करें तो मंदिर बहुत छोटा है, लेकिन अब बाहर के हिस्से को शेड से कवर किया गया है। मंदिर के प्रांगण में पुराना पीपल का पेड़ मौजूद है, जहां मात्र धागा बांधने से मनोकामना पूरी होती है। माना जाता है कि मंदिर का निर्माण राजा विक्रमादित्य ने कराया था।