गुवाहाटी, 10 फरवरी (आईएएनएस)। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने मंगलवार को कहा कि राज्य सरकार ने समकालीन भारत की सबसे व्यापक भूमि सुधार पहलों में से एक की शुरुआत की है। इसके तहत 3.5 लाख से अधिक चाय बागान श्रमिक परिवारों को भूमि का मालिकाना अधिकार दिया गया है। इसे चाय जनजाति समुदाय के लिए सामाजिक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया जा रहा है।
मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए कहा कि यह सुधार असम फिक्सेशन ऑफ सीलिंग ऑन लैंड होल्डिंग्स (संशोधन) अधिनियम, 2025 के जरिए लागू किया गया है। यह उन चाय बागान श्रमिकों के साथ दशकों से चली आ रही अन्यायपूर्ण स्थिति को खत्म करता है, जिन्होंने पीढ़ियों तक असम की प्रसिद्ध चाय उद्योग में योगदान दिया, लेकिन जिस जमीन पर वे रहते थे, उसका स्वामित्व कभी उनके पास नहीं था।
सरमा ने कहा, “करीब 200 वर्षों तक चाय बागान श्रमिकों ने असम की मशहूर चाय उगाई, लेकिन उनके नाम पर एक इंच जमीन भी नहीं थी। वे चाय बागानों के भीतर लेबर लाइनों में रहते थे और बागान बंद होने या नौकरी खत्म होने की स्थिति में हमेशा बेदखली के खतरे में रहते थे।”
उन्होंने बताया कि पहले के भूमि कानूनों के तहत चाय बागानों को भूमि सुधार के दायरे से बाहर रखा गया था, जिसके चलते श्रमिकों को मालिकाना हक नहीं मिल सका। कानूनी रूप से उनके घरों के नीचे की जमीन चाय कंपनियों की संपत्ति मानी जाती थी, न कि श्रमिकों की।
मुख्यमंत्री ने कहा कि संशोधित कानून ने इस स्थिति को पूरी तरह बदल दिया है। नए प्रावधानों के तहत राज्य सरकार चाय बागानों से लेबर लाइन की जमीन अधिग्रहित कर पात्र श्रमिक परिवारों को भूमि पट्टा (पट्टा) प्रदान कर रही है।
उन्होंने कहा, “इससे श्रमिक केवल रहने वाले नहीं, बल्कि जमीन के वास्तविक मालिक बन गए हैं।”
यह भूमि सुधार राज्य के 825 से अधिक चाय बागानों को कवर करता है और 3.5 लाख से ज्यादा चाय बागान परिवारों को लाभ पहुंचाता है। अधिकारियों के मुताबिक, यह हाल के वर्षों में देश की सबसे बड़ी भूमि पुनर्वितरण पहलों में से एक है।
इस कदम से न सिर्फ श्रमिकों को अपने घरों से बेदखल किए जाने का खतरा खत्म होगा, बल्कि वे प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी आवासीय योजनाओं के तहत लाभ पाने के भी पात्र बनेंगे।
सरमा ने कहा कि यह पहल चाय जनजाति समुदाय के दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक उत्थान में अहम भूमिका निभाएगी और उन्हें आवास सुरक्षा के साथ-साथ विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच सुनिश्चित करेगी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह फैसला समावेशी विकास के प्रति राज्य सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जबकि विपक्ष, उनके अनुसार, “शोर मचाने” में व्यस्त है। उन्होंने कहा कि असम ने भाषणबाजी के बजाय संरचनात्मक सुधार और सशक्तिकरण का रास्ता चुना है।
उन्होंने जोर देते हुए कहा कि यह भूमि सुधार चाय जनजाति समुदाय की गरिमा, अधिकारों और योगदान को मान्यता देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है, जो असम की अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान का एक अहम स्तंभ है।

