नई दिल्ली, 15 फरवरी (आईएएनएस)। बलूचिस्तान में हाल के दिनों में बलूच उग्रवादियों और पाकिस्तानी सेना के बीच बढ़ी हिंसा और खूनी टकराव ने क्षेत्र को वैश्विक सुर्खियों में ला दिया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक यह संकट अचानक पैदा नहीं हुआ, बल्कि पाकिस्तान सेना की कथित ज्यादतियों और दमनकारी नीतियों के कारण लंबे समय से सुलग रहा था।
प्रमुख पोर्टल यूरेशिया रिव्यू में प्रकाशित एक विश्लेषण में कहा गया है कि यह केवल क्षेत्रीय संकट नहीं, बल्कि पाकिस्तानी राज्य की संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर करता है। रिपोर्ट के अनुसार जब राजनीति का ‘सैन्यीकरण’ हो जाता है और सेना अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर निर्णय प्रक्रिया में दखल देने लगती है, तो उसके गंभीर परिणाम सामने आते हैं।
पाकिस्तान सरकार जहां इस विद्रोह के पीछे ‘विदेशी हाथ’ होने की बात करती है, वहीं स्थानीय लोग इसे केंद्र सरकार की निरंकुश और दमनकारी नीतियों का परिणाम मानते हैं। उनका आरोप है कि लंबे समय से राजनीतिक उपेक्षा, मानवाधिकार उल्लंघन और संसाधनों के दोहन ने हालात को विस्फोटक बना दिया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भले ही बलूचिस्तान का विशाल बंजर भूभाग पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान नहीं देता, लेकिन इसे ‘अवसरों की भूमि’ के रूप में वैश्विक मंच पर पेश किया जाता है। खासतौर पर यह क्षेत्र चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के तहत चीन के निवेश का केंद्र है और इस्लामाबाद हाल के दिनों में अमेरिकी पूंजी को भी खनन क्षेत्र में आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है।
बलूचिस्तान तांबा, सोना, कोयला और गैस जैसे खनिज संसाधनों से समृद्ध है, जिन्हें पाकिस्तान की आर्थिक पुनर्बहाली की कहानी का अहम हिस्सा बताया जा रहा है। लेकिन रिपोर्ट के अनुसार भारी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद बुनियादी स्थिरता सुनिश्चित नहीं की जा सकी है और लगातार हमले इस बात का संकेत हैं कि सैन्यीकरण से स्थायी शांति नहीं मिल सकी।
भौगोलिक दृष्टि से भी बलूचिस्तान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पाकिस्तान को अरब सागर तक पहुंच प्रदान करता है, ईरान और अफगानिस्तान की सीमाओं से जुड़ा है और चीन को हिंद महासागर से जोड़ने वाले भूमि मार्ग का अहम हिस्सा है।
हाल के समय में प्रांत में विरोध-प्रदर्शनों और हिंसक घटनाओं में वृद्धि देखी गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर, जिन्हें हाल ही में फील्ड मार्शल का पद दिया गया, के कार्यकाल में सैन्य-नागरिक संबंध और बिगड़े हैं, जिससे हालात रणनीतिक गतिरोध की स्थिति में पहुंच गए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक 2019 के बाद से, जब सुरक्षा अभियानों की तीव्रता बढ़ी, पाकिस्तानी सेना ने बलूचिस्तान में अपने हताहतों के आंकड़ों को व्यवस्थित रूप से कम करके दिखाया है। वहीं जबरन गायब किए जाने, फर्जी मुठभेड़ों और बलूच कार्यकर्ताओं की सामूहिक गिरफ्तारियों जैसे मुद्दों पर गंभीर चिंताओं के बावजूद ठोस समाधान नहीं निकाला गया।
इस्लामाबाद लगातार बलूचिस्तान को केवल ‘सुरक्षा समस्या’ के रूप में पेश करता रहा है और मूल राजनीतिक संकट को स्वीकार नहीं किया। जब स्थानीय लोगों ने मार्च और छात्र प्रदर्शनों के जरिए असहमति जताई, तो उन्हें गिरफ्तारियों, मीडिया ब्लैकआउट और डराने-धमकाने का सामना करना पड़ा।
रिपोर्ट के निष्कर्ष में कहा गया है कि बलूचिस्तान केवल वहां के लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान के भविष्य के लिए भी एक नासूर बनता जा रहा है।

