नई दिल्ली, 29 जनवरी (आईएएनएस)। दिल्ली की एक अदालत ने नर्मदा बचाओ आंदोलन (एनबीए) की कार्यकर्ता मेधा पाटकर द्वारा दायर मानहानि मामले में उपराज्यपाल वीके सक्सेना को बड़ी राहत दी है। अदालत ने उनको बरी कर दिया है।
साकेत न्यायालय के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी राघव शर्मा ने आदेश दिया कि यह माना जाता है कि शिकायतकर्ता (पाटकर) आरोपी के खिलाफ अपने मामले को संदेह से परे साबित करने में विफल रही हैं। आरोपी वीके सक्सेना को आईपीसी की धारा 500 के तहत दंडनीय अपराध से बरी किया जाता है।
अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह पता चले कि सक्सेना ने नर्मदा बचाओ आंदोलन (एनबीए) की नेता मेधा पाटकर के बारे में व्यक्तिगत रूप से कोई विज्ञापन प्रकाशित किया था। इसमें आगे कहा गया कि विज्ञापन को ध्यान से पढ़ने पर पता चलता है कि आलोचना एनबीए संगठन और विशिष्ट व्यक्तियों के खिलाफ थी, न कि मेधा पाटकर के खिलाफ।
25 साल पुराना यह मुकदमा उस समय का है, जब सक्सेना गुजरात में सक्रिय थे और उन्होंने दिल्ली के राज निवास में कार्यभार नहीं संभाला था। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर यह मामला अहमदाबाद से दिल्ली की साकेत अदालत में स्थानांतरित किया गया था।
2000 में जब पाटकर ने उनके और नर्मदा बचाओ आंदोलन के खिलाफ विज्ञापन प्रकाशित करने के लिए सक्सेना के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया था, तब सक्सेना अहमदाबाद स्थित गैर सरकारी संगठन ‘काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज’ के प्रमुख थे।
बाद में, सक्सेना ने उन्हें बदनाम करने के लिए पाटकर के खिलाफ मानहानि का मुकदमा भी दायर किया था। इस मामले में पाटकर को पांच महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई गई और सक्सेना को मुआवजे के तौर पर 10 लाख रुपए देने का आदेश दिया गया।
बाद में सजा निलंबित कर दी गई और उन्हें जमानत मिल गई। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा को रद्द कर दिया और स्पष्ट किया कि सुपरविजन ऑर्डर नहीं होगा।

