नई दिल्ली, 27 फरवरी (आईएएनएस)। भारत द्वारा आधार वर्ष को नियमित अंतराल पर बदलना, वैश्विक अर्थव्यवस्था में आने वाले झटकों से निपटने के लिए डेटा-आधारित नीतिगत हस्तक्षेप के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता और ग्लोबल वैल्यू चेन में देश के तेजी से बढ़ते एकीकरण को दर्शाता है। यह जानकारी अर्थशास्त्रियों की ओर से शुक्रवार को दी गई।
पीएचडीसीसीआई के अध्यक्ष राजीव जुनेजा ने कहा कि संशोधित जीडीपी फ्रेमवर्क भारत के राष्ट्रीय खातों की विश्वसनीयता और विश्लेषणात्मक उपयोगिता को बढ़ाएगा। नई पद्धति से नीति निर्माताओं, व्यवसायों और निवेशकों को विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधि की अधिक सटीक तस्वीर मिलने की उम्मीद है।
नई सीरीज जीएसटी आंकड़ों, सूचीबद्ध कंपनियों के वित्तीय परिणामों, परिवहन संकेतकों और डिजिटल प्रशासनिक स्रोतों जैसे कई डेटा स्रोतों को एकीकृत करती है।
जुनेजा ने कहा कि इस व्यापक डेटा कवरेज से आर्थिक उत्पादन, उपभोग, निवेश और क्षेत्रीय योगदान के मापन को मजबूती मिलने की उम्मीद है और इससे भारत विकास के अगले चरण के लिए तैयार हो सकेगा।
पीएचडीसीसीआई के सीईओ और सलाहकार डॉ. रंजीत मेहता ने कहा, “भारत की ग्रोथ स्टोरी में निवेश करने के इच्छुक विदेशी निवेशक, चाहे वे संस्थागत हों या गैर-संस्थागत, इसे विश्वसनीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुलनीय आंकड़ों के रूप में देखेंगे, जो भारत की निजी पूंजीगत व्यय-संचालित विकास गति को बढ़ाने के लिए शुभ संकेत है।”
आईसीआरए लिमिटेड की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग जीवीए में लगातार पांचवीं तिमाही में उत्साहजनक रूप से दोहरे अंकों की वृद्धि हुई, जबकि सर्विसेज जीवीए की वृद्धि दर पिछली तिमाही के 9.3 प्रतिशत से बढ़कर 7 तिमाहियों के उच्चतम स्तर 9.5 प्रतिशत पर पहुंच गई।
उन्होंने कहा, “आईसीआरए का मानना है कि निकट भविष्य में आधार-आधारित सीपीआई मुद्रास्फीति में वृद्धि की उम्मीदों के साथ नीतिगत दर में लंबे समय तक कोई बदलाव न होने की अधिक संभावना है।”

