महाशिवरात्रि स्पेशल: यहां मौजूद हैं शक्तिशाली कृतिवासेश्वर महादेव, बहुत कम लोगों को मिलता है दर्शन का सौभाग्य

0
6

नई दिल्ली, 11 फरवरी (आईएएनएस)। सृष्टि की उत्पत्ति और संहार के अधिपति भगवान शिव को माना जाता है। स्वभाव से भोलेनाथ भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होते हैं, तो क्रोध आने पर संहारक रूप धारण करते हैं। आस्था के प्रमुख केंद्र वाराणसी में महादेव के असंख्य स्वरूपों की पूजा होती है, लेकिन इसी पवित्र नगरी में एक ऐसा स्थल भी है, जहां आज तक शिव को उनका पारंपरिक स्थान पूरी तरह वापस नहीं मिल सका है।

हम बात कर रहे हैं काशी के प्राचीन और शक्तिशाली मंदिरों में गिने जाने वाले कृतिवासेश्वर महादेव की। वर्तमान में यह स्थल ऐसी स्थिति में है कि बाबा खुले आसमान के नीचे विराजमान रहने को विवश बताए जाते हैं। यह स्थान धार्मिक आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक और विवादित पृष्ठभूमि के कारण भी लंबे समय से चर्चा में रहा है।

कृतिवासेश्वर महादेव को काशी के अत्यंत प्राचीन शिवालयों में माना जाता है। मान्यता है कि यह वही स्थान है, जिसका उल्लेख स्कंद पुराण में भी मिलता है। पुराणों के अनुसार, यहीं भगवान शिव ने एक राक्षस का वध कर उसकी चर्म को अपना वस्त्र धारण किया था। इसी कारण उन्हें कृतिवासेश्वर नाम से जाना गया।

वर्तमान में कृतिवासेश्वर महादेव का स्वरूप वाराणसी स्थित आलमगीर मस्जिद के पीछे वाले हिस्से में स्थित है। विवादित स्थिति के कारण यहां दर्शन-पूजन की व्यवस्था सामान्य मंदिरों की तरह सुगम नहीं है। परिणामस्वरूप बहुत कम श्रद्धालुओं को यहां नियमित रूप से दर्शन का अवसर मिल पाता है।

स्कंद पुराण में मौजूद पौराणिक कथा की मानें तो गजासुर नाम का एक असुर था, जिसने भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या करके अपार शक्ति प्राप्त कर ली और काशी के देवताओं और भक्तों सहित तीनों लोकों में आतंक मचाना शुरू कर दिया। गजासुर के अत्याचारों का अंत करने के लिए भगवान शिव स्वयं पृथ्वी पर आए और भीषण युद्ध के बाद त्रिशूल पर लटकाकर उस राक्षस का वध कर दिया। लेकिन भगवान शिव ने गजासुर की विनम्र प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और उसकी चर्म को उसके चारों ओर लपेटकर शिवलिंग का रूप धारण कर लिया, जिसकी आज कृतिवासेश्वर महादेव के रूप में पूजा की जाती है।

इतना ही नहीं, कृतिवासेश्वर महादेव की गिनती काशी के 14 शक्तिशाली मंदिरों में होती है। स्कंद पुराण में मंदिर का जिक्र करते हुए बताया गया है कि ये शिवलिंग भगवान शिव का मस्तक है। भगवान शिव का मस्तक होने की वजह से एक समय मंदिर की ख्याति बहुत थी, लेकिन आक्रमणकारियों के आने के बाद मंदिर को खंडित करने का काम किया और प्राचीन शिवलिंग को तोड़ा गया। मंदिर की आस्था और भगवान शिव के आशीर्वाद को बरकरार रखने के लिए हिंदू समुदाय के लोगों ने एक नए शिवलिंग की स्थापना की, जिसकी पूजा आज तक होती आ रही है।

सावन और महाशिवरात्रि के मौके पर कृतिवासेश्वर महादेव का अद्भुत शृंगार होता है, लेकिन वहां तक पहुंचने वाले भक्तों की संख्या बहुत कम है। मंदिर के स्थान को वापस पाने के लिए कोर्ट में मामला लंबित है, और यही वजह है कि बहुत कम ही भक्त मंदिर तक पहुंच पाते हैं।