मन्नू भंडारी और निर्मल वर्मा: एक ने लिखा समाज का दर्द, दूसरे ने मन का एकांत

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नई दिल्ली, 2 अप्रैल (आईएएनएस)। 3 अप्रैल हिंदी साहित्य के लिए खास दिन है। इसी दिन दो ऐसे लेखकों का जन्म हुआ, जिन्होंने अपनी-अपनी तरह से हमारे जीवन को शब्द दिए। ये लेखक थे मन्नू भंडारी (1931) और निर्मल वर्मा (1929)। दिलचस्प बात यह है कि दोनों की लेखनी की दिशा अलग, लेकिन असर उतना ही गहरा रहा।

अगर आप मन्नू भंडारी को पढ़ते हैं, तो लगता है जैसे आसपास की दुनिया ही किताब बन गई हो। उनके पात्र कोई काल्पनिक लोग नहीं, बल्कि हमारे अपने घर-परिवार के लोग लगते हैं। रिश्तों की उलझन, टूटते परिवार, बच्चों का दर्द ये सब उन्होंने इतनी सहज भाषा में लिखा कि पाठक सीधे जुड़ जाता है। उनका उपन्यास ‘आपका बंटी’ पढ़ते हुए एक बच्चे की पीड़ा भीतर तक चुभती है। वहीं ‘महाभोज’ में उन्होंने समाज और राजनीति की सच्चाइयों को बेबाकी से सामने रखा। उनकी कहानी ‘यही सच है’ पर बनी फिल्म रजनीगंधा ने तो जैसे आम जिंदगी की छोटी-छोटी भावनाओं को बड़े पर्दे पर जीवंत कर दिया।

मन्नू भंडारी की खासियत यही थी कि वे बड़ी बात को बहुत आसान तरीके से कह देती थीं। उनकी भाषा में कोई बनावट या दिखावा नहीं, बस सीधी, सच्ची और दिल को छू लेने वाली अभिव्यक्ति होती थी। शायद यही वजह है कि उनकी रचनाएं आज भी उतनी ही ताजा लगती हैं।

अगर मन्नू भंडारी हमें समाज के बीच ले जाती हैं, तो निर्मल वर्मा हमें हमारे भीतर झांकने पर मजबूर करते हैं। उनकी कहानियां और उपन्यास पढ़ते हुए लगता है जैसे हम अपने ही मन के किसी कोने में बैठकर खुद से बात कर रहे हों। यही वजह है कि उन्हें ‘अकेलेपन का लेखक’ भी कहा जाता है।

निर्मल वर्मा की लेखनी में एक खास तरह का दर्द, शांति और गहराई है। वे सीधे-सीधे बात नहीं कहते, बल्कि संकेतों और अनुभवों के जरिए पाठक को सोचने पर मजबूर करते हैं। उनकी कहानी ‘परिंदे’ से उन्हें पहचान मिली और फिर ‘वे दिन’, ‘लाल टीन की छत’ जैसे उपन्यासों ने उन्हें हिंदी साहित्य में एक अलग ही मुकाम दिया। उनकी रचनाओं में अक्सर एक ऐसा पात्र मिलता है जो भीड़ में भी अकेला है और अपने भीतर की उलझनों से जूझ रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि निर्मल वर्मा ने सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि यूरोप में रहकर भी लिखा। इस वजह से उनकी रचनाओं में भारतीय और पश्चिमी संस्कृति का एक अनोखा मेल दिखाई देता है। वे बाहरी दुनिया से ज्यादा भीतर की यात्रा पर ध्यान देते थे। एक ऐसी यात्रा, जो हर इंसान अपने जीवन में कभी न कभी करता है।

अब अगर इन दोनों को एक साथ देखें तो दोनों में एक खूबसूरत विरोधाभास नजर आता है। मन्नू भंडारी की दुनिया में समाज है, रिश्ते हैं और संघर्ष है। वहीं निर्मल वर्मा की दुनिया में खामोशी है, आत्ममंथन है और भीतर चल रही हलचल है। एक हमें बाहर की सच्चाई दिखाता है, दूसरा भीतर की।

लेकिन इन दोनों में एक चीज समान है संवेदनशीलता। दोनों ने इंसान को समझने की कोशिश की, बस नजरिया अलग था। आज के समय में, जब जिंदगी पहले से ज्यादा तेज और उलझी हुई हो गई है, तो मन्नू भंडारी हमें हमारे रिश्तों की अहमियत याद दिलाती हैं और निर्मल वर्मा हमें खुद से जुड़ने का मौका देते हैं।