पद्म भूषण विद्यानिवास मिश्र: हजारी प्रसाद-कुबेरनाथ के साथ त्रयी का तीसरा स्तंभ, परंपरा और आधुनिकता के बीच बनाया पुल

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नई दिल्ली, 13 फरवरी (आईएएनएस)। हिंदी साहित्य जगत को उस समय एक अपूरणीय क्षति हुई, जब प्रसिद्ध साहित्यकार, संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान, भाषाविद् और सफल संपादक पंडित विद्यानिवास मिश्र ने दुनिया को अलविदा कहा। 14 फरवरी 2005 को देवरिया से वाराणसी जाते समय हुई सड़क दुर्घटना में उनका लगभग 79 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनका जाना हिंदी के ललित निबंध परंपरा के एक प्रमुख स्तंभ का अंत था, जिसे हजारी प्रसाद द्विवेदी और कुबेरनाथ राय के साथ त्रयी में गिना जाता है।

विद्यानिवास मिश्र का जन्म 28 जनवरी 1926 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के पकड़डीहा गांव में हुआ था। गांव और गोरखपुर में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने वाराणसी में संस्कृत का गहन अध्ययन किया। गोरखपुर विश्वविद्यालय से 1960-61 में पाणिनि की व्याकरण पर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने अमेरिका में भी शोध किया। कैलिफोर्निया (बर्कले) विश्वविद्यालय में शोध कार्य किया और 1967-68 में वाशिंगटन विश्वविद्यालय में अध्येता रहे। वहां हिंदी साहित्य और तुलनात्मक भाषा विज्ञान का अध्यापन किया।

उनका व्यावसायिक जीवन विविध रहा। उन्होंने हिंदी साहित्य सम्मेलन, रेडियो, विंध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के सूचना विभागों में कार्य किया। बाद में वे अध्यापन क्षेत्र में आए। 1968 से 1977 तक वे सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में अध्यापक रहे और बाद में कुलपति भी बने। वे काशी विद्यापीठ के कुलपति और कुलपति मुंशी हिंदी विद्यापीठ, आगरा के निदेशक रहे। सबसे महत्वपूर्ण योगदान एक महत्वपूर्ण समाचार पत्र के प्रधान संपादक के रूप में था, जहां उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को नई ऊंचाई दी।

साहित्यिक योगदान में ललित निबंध उनकी विशेष पहचान है। उनकी कोमल, भावपूर्ण और संस्कृत-समृद्ध भाषा ने निबंध को नई गहराई दी। अगर प्रमुख रचनाओं की बात करें तो उनमें ‘अग्निपर्ण’, ‘अंतराल’, ‘भारत की संस्कृति’, ‘संस्कृत और हमारी संस्कृति’ आदि प्रमुख रहीं। वे संस्कृत व्याकरण, भाषाविज्ञान और भारतीय संस्कृति पर गहन लेखन करते थे। उनकी लेखनी में लोक और शास्त्र का सुंदर समन्वय दिखता है, जिसमें भोजपुरी की मिठास और संस्कृत की गरिमा एक साथ रहती है।

उन्हें 1988 में पद्म श्री और 1999 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। वे राज्यसभा के नामित सदस्य रहे। वे भारतीय ज्ञानपीठ के ट्रस्टी बोर्ड सदस्य और मूर्तिदेवी पुरस्कार समिति के अध्यक्ष थे। साहित्य अकादेमी ने उन्हें फेलो बनाया।

2005 में उनका निधन हिंदी साहित्य के लिए बड़ा आघात था। आज भी उनके निबंध पढ़कर लगता है कि वे जीवित हैं। शब्दों में बहती वह कोमल धारा, जो संस्कृति, भाषा और मानवीय संवेदना को जोड़ती है। विद्यानिवास मिश्र हिंदी के उन विरले व्यक्तित्वों में से हैं, जिन्होंने परंपरा और आधुनिकता के बीच पुल बनाया। उनकी स्मृति में आज भी साहित्यकार और पाठक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उनका जाना एक युग का अंत था, लेकिन उनकी रचनाएं अमर हैं।