नई दिल्ली, 22 मार्च (आईएएनएस)। हर साल ‘शहीद दिवस’ इस बात की याद दिलाता है कि भारत की आजादी बलिदान और साहस के बल पर अर्जित की गई थी। देश के स्वतंत्रता संग्राम में हजारों ऐसे नौजवान भी थे, जिन्होंने अपनी ताकत के बल पर आजादी दिलाने की ठानी और क्रांतिकारी कहलाए। लेकिन देश में जब भी क्रांतिकारियों का नाम लिया जाता है तो उनमें सबसे पहले शहीद भगत सिंह और उनके साथी राजगुरु और सुखदेव का नाम आता है।
हर साल 23 मार्च को भारत के तीन असाधारण क्रांतिकारियों के बलिदान को याद करने के लिए ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। 23 मार्च को, देश के तीन नायकों को अंग्रेजों की ओर से फांसी दे दी गई थी। भारत के इन क्रांतिकारियों ने महात्मा गांधी से अलग रास्ता चुना, लेकिन यह सब उस देश के कल्याण के लिए था, जिससे वे बेहद प्यार करते थे।
“दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फत, मेरी मिट्टी से भी खुशबु ए वतन आएगी।”
यह पंक्ति क्रांतिकारी भगत सिंह की है, जिन्होंने नौजवानों में ऊर्जा का ऐसा गुबार भरा था कि विदेशी हुकूमत को उनसे डर लगने लगा था। हाथ जोड़कर निवेदन करने की जगह लोहे से लोहा लेने की आग के साथ आजादी की लड़ाई में कूदने वाले भगत सिंह की दिलेरी की कहानियां आज भी हमारे अंदर देशभक्ति की चिंगारी जलाती हैं।
सच्चे क्रांतिकारी और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा देने वाले शहीद भगत सिंह ने क्रांति की वेदी पर अपनी जवानी को फूल की तरह चढ़ा दिया। 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर में हुए जलियावाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था।
यह वही काला दिन था, जब इस हत्याकांड के कारण पूरे देश के साथ-साथ 12 साल के भगत सिंह के दिल में भी अंग्रेजों के लिए नफरत जन्म ले चुकी थी। साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाला लाजपत राय की हत्या का बदला लेने के लिए भगत सिंह समेत उनके सहयोगियों ने अंग्रेज अफसर सांडर्स की हत्या की थी। अंग्रेजों की बहरी सरकार को जगाने के लिए भगत सिंह ने अपने सहयोगी बटकेश्वर दत्त के साथ दिल्ली विधानसभा में 8 अप्रैल 1929 को बम फेंका। धमाके के बाद वे कहीं भागे नहीं, बल्कि अपनी गिरफ्तारी दी।
भगत सिंह करीब दो साल जेल में रहे। इस दरम्यान उन्होंने कई लेख लिखे और अपने क्रांतिकारी विचारों की अलख को जगाए रखा। भगत सिंह के साथ आजादी की लड़ाई लड़ने वालों में राजगुरु यानी शिवराम हरि राजगुरु और सुखदेव यानी सुखदेव थापर भी थे।
तीनों देशभक्त नौजवान ‘भारत सभा’ और ‘हिंदुस्तान समाजवादी रिपब्लिकन आर्मी’ के अनोखे वीर थे। तीनों की मित्रता इसलिए भी सुदृढ़ और मजबूत थी क्योंकि उनकी विचारधारा और सोच एक थी, और वह थी देश की आजादी। आजादी के इन मतवालों ने अपनी अंतिम सांस तक अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया और दिल में आजादी का सपना लिए हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए।
इन तीनों ही वीर क्रांतिकारियों को 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में फांसी दे दी गई। इन तीन वीर सपूतों ने अपनी कुर्बानी दी, क्योंकि उनका मानना था कि ये ऐसा वक्त है जब बलिदान की जरूरत है। भारत जब भी अपने आजाद होने पर गर्व महसूस करता है तो उसका सिर इन महापुरुषों के लिए हमेशा झुकता है।

