मुंबई, 12 मार्च (आईएएनएस)। पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) का मुद्दा सुर्खियों में है। साल 2013 से कोमा में रह रहे हरियाणा के हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इच्छा मृत्यु की अनुमति दे दी है। परिवार की गुहार पर अदालत ने फैसला दिया है। भारतीय सिनेमा ने इस संवेदनशील विषय को कई बार गहराई से छुआ है। ये फिल्में न सिर्फ इच्छामृत्यु पर बहस छेड़ती हैं, बल्कि मरीज की गरिमा, परिवार के दर्द और समाज के नैतिक सवालों को भी उठाती हैं।
हरीश राणा केस के बाद इन फिल्मों की चर्चा फिर तेज हो गई है। फिल्म ‘शायद’ साल 1979 में आई थी, जो भारतीय सिनेमा में इच्छामृत्यु पर सबसे पहले बनी फिल्म मानी जाती है। इसे मदन बावरिया ने निर्देशित किया था। नीता मेहता, विजयेंद्र घाटगे, ओम पुरी और नसीरुद्दीन शाह ने अहम भूमिका निभाई। वहीं, सिमी ग्रेवाल ने डिफेंस अटॉर्नी, इफ्तेखार ने प्रॉसिक्यूशन लॉयर, अच्युत पोतदार ने जज और नादिरा भी अहम किरदार में थे। सपोर्टिंग कास्ट में फरीदा जलाल, पूर्णिमा जयराम, भारत कपूर, नितिन सेठी और बेबी मनीषा मुंशी शामिल हैं।
शायद की कहानी एक टर्मिनल बीमारी से पीड़ित व्यक्ति की है, जो दर्द से तड़प रहा है और पूछता है कि क्या उसे जीने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए। फिल्म ने उस समय समाज में इच्छामृत्यु पर बहस शुरू की और आज भी प्रासंगिक बनी हुई है।
संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘गुजारिश’ साल 2010 में रिलीज हुई थी, जिसमें ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या रॉय लीड रोल में हैं। इच्छामृत्यु पर बनी चर्चित बॉलीवुड फिल्म में ऋतिक रोशन ने लकवाग्रस्त जादूगर एथन मस्करेन्हा का किरदार निभाया, जो एक हादसे के बाद आंशिक लकवाग्रस्त हो जाता है। ऋतिक और ऐश्वर्या के साथ आदित्य रॉय कपूर भी अहम भूमिकाओं में थे। एथन अदालत से इच्छामृत्यु की गुहार लगाता है। फिल्म ने मरीज की पीड़ा, गरिमा और कानूनी संघर्ष को बेहद संवेदनशीलता से दिखाया।
रेवती के निर्देशन में बनी ‘सलाम वेंकी’ सच्ची कहानी पर आधारित फिल्म है। इसमें काजोल और विशाल जेठवा मुख्य भूमिकाओं में हैं। फिल्म युवक वेंकी की कहानी है, जो एएलएस बीमारी से पीड़ित है। वह अपनी इच्छामृत्यु की कानूनी लड़ाई लड़ता है। फिल्म ने परिवार के भावनात्मक संघर्ष और समाज में इस मुद्दे की जागरूकता पर फोकस किया।
फिल्मों के अलावा, इस गंभीर विषय पर डॉक्यूमेंट्री भी बन चुकी है। ‘पैसिव यूथेनेशिया-कहानी करुणा की’ साल 2014 में रिलीज हुई थी, जिसका निर्देशन चेतन शाह ने किया है। यह अरुणा शानबाग केस पर केंद्रित है, जिसने साल 2011 में भारत में पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता दिलाई। फिल्म ‘लिविंग विल’ की जरूरत और करुणा के आधार पर जीवन समाप्ति के अधिकार पर गहराई से बात करती है।

