नई दिल्ली, 23 मार्च (आईएएनएस)। नाजी जर्मनी के कड़े सुरक्षा वाले युद्धबंदी शिविर स्टालाग लुफ्ट तृतीय से 70 से अधिक मित्र राष्ट्रों के सैनिकों का सुरंग बनाकर भाग निकलना इतिहास में ‘द ग्रेट एस्केप’ के नाम से दर्ज है। 24 मार्च 1944 की रात हुई ये साधारण फरारी नहीं थी, बल्कि महीनों की गुप्त योजना, इंजीनियरिंग कौशल और असाधारण साहस का परिणाम थी।
इस अभियान के पीछे ब्रिटिश वायुसेना के अधिकारी रोजर बुशेल का दिमाग था, जिन्हें “बिग एक्स” कहा जाता था। उन्होंने एक साथ तीन सुरंगें—”टॉम”, “डिक” और “हैरी”—खोदने की योजना बनाई, ताकि अगर एक पकड़ी जाए तो दूसरी का इस्तेमाल किया जा सके। कैदियों ने बिस्तरों के तख्तों, खाने के डिब्बों और साधारण औजारों से लगभग 100 मीटर लंबी सुरंग बनाई, जिसमें हवा के लिए पाइप, रोशनी के लिए अस्थायी बिजली और मिट्टी छुपाने के जटिल तरीके अपनाए गए।
भागने में कुल 76 कैदी सफल हुए, लेकिन यह आजादी ज्यादा देर नहीं टिक सकी। नाजी शासन का नेतृत्व कर रहे एडोल्फ हिटलर के आदेश पर पकड़े गए 50 कैदियों को बाद में गोली मार दी गई—जो युद्ध कानूनों का गंभीर उल्लंघन था और बाद में युद्ध अपराध माना गया।
इस घटना का सबसे विश्वसनीय विवरण पॉल ब्रिकहिल की किताब “द ग्रेट एस्केप” में मिलता है। ब्रिकहिल खुद भी उसी शिविर में कैदी थे। वे लिखते हैं कि यह फरारी सिर्फ भागने के लिए नहीं थी, बल्कि दुश्मन को यह दिखाने के लिए थी कि कैदियों का मनोबल नहीं टूटा है—”यह आजादी से ज्यादा, प्रतिरोध का प्रतीक था।”
इसी भावना को रोजर बुशेल के एक कथन में भी देखा जाता है, जो अक्सर उद्धृत किया जाता है—”हमारा कर्तव्य सिर्फ भागना नहीं, बल्कि जितने अधिक जर्मन संसाधनों को इसमें उलझाना है, उतना ही युद्ध में योगदान देना है।”
इस तरह “द ग्रेट एस्केप” सिर्फ एक साहसी कहानी नहीं, बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मनोबल, रणनीति और प्रतिरोध की एक अनोखी मिसाल बन गई। जिस पर 1963 में एक फिल्म भी बनी और जबरदस्त कमाई भी की थी।

