उपराष्ट्रपति ने सुधा मूर्ति की पुस्तक का किया विमोचन, बोले-भारत हमेशा से एक रहा है और सदा एक रहेगा

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नई दिल्ली, 1 अप्रैल (आईएएनएस)। भारत के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने बुधवार को नई दिल्ली के संविधान सदन में लोकसभा सचिवालय द्वारा प्रकाशित और राज्यसभा सांसद सुधा मूर्ति द्वारा लिखित पुस्तक ‘टाइड्स ऑफ टाइम: हिस्ट्री थ्रो म्यूरल्स इन पार्लियामेंट’ का विमोचन किया।

इस अवसर पर सभा को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने सुधा मूर्ति की “संसदीय भित्ति चित्रों की शाश्वत सुंदरता और गहन प्रतीकात्मकता” को चित्रित करने के साथ-साथ पीढ़ियों से लोगों को इतिहास से जोड़ने के उनके प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि संविधान सदन के भित्ति चित्र (म्यूरल पेंटिंग) मात्र कलाकृतियां नहीं हैं बल्कि भारत की सभ्यतागत यात्रा को प्रतिबिंबित करने वाली दृश्य कथाएं हैं।

उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि उत्तर में वैशाली से लेकर दक्षिण में कुडावोलाई प्रणाली तक भारत में लोकतांत्रिक प्रथाएं निरंतर, समावेशी और समाज में गहराई से समाई हुई हैं। ये परंपराएं एक व्यापक सभ्यतागत लोकाचार का हिस्सा हैं जो संवाद, आम सहमति और विविध विचारों के सम्मान को महत्व देता है, जिससे भारत “लोकतंत्र की जननी” बन जाता है।

महान तमिल कवि सुब्रमण्यम भारती का जिक्र करते हुए उपराष्ट्रपति ने भारत के ज्ञान, गरिमा, दानशीलता और सांस्कृतिक गहराई की समृद्धि को रेखांकित किया और कहा कि ऐसी नींव स्वाभाविक रूप से समावेशिता और सभी आवाजों के सम्मान को बढ़ावा देती है।

उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में संसद भवन में पारंपरिक प्रतीकों के समावेश की सराहना की। उन्होंने संसद के संयुक्त सत्र में राष्ट्रपति के संबोधन के दौरान चोल वंश के पवित्र सेन्गोल के औपचारिक प्रदर्शन का भी उल्लेख किया और इसे आधुनिक भारत को उसकी सभ्यतागत जड़ों से जोड़ने वाला एक सशक्त प्रतीक बताया।

उन्होंने कहा कि संसद एक जीवंत लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों, संवाद, वाद-विवाद, असहमति और चर्चा का प्रतिनिधित्व करती है। चर्चा, वाद-विवाद और असहमति महत्वपूर्ण हैं लेकिन अंततः इनका योगदान राष्ट्रीय हित में रचनात्मक निर्णय लेने में होना चाहिए।

पुस्तक को भारत की सभ्यतागत यात्रा के लिए एक उल्लेखनीय श्रद्धांजलि बताते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह 124 म्यूरल पेंटिंग के वर्णन के माध्यम से इतिहास को जीवंत कर देती है। पुस्तक सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर महर्षि वाल्मीकि और चाणक्य जैसे महान विचारकों के ज्ञान और महावीर व गौतम बुद्ध की आध्यात्मिक शिक्षाओं तक फैली हुई है। उन्होंने कहा कि यह भारत की प्रारंभिक लोकतांत्रिक परंपराओं, अशोक और छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे शासकों की उपलब्धियों और कोणार्क सूर्य मंदिर जैसे स्मारकों और भक्ति आंदोलन जैसे आंदोलनों में परिलक्षित सांस्कृतिक समृद्धि को भी उजागर करती है। यह पुस्तक दांडी मार्च जैसे आंदोलनों और महात्मा गांधी व सुभाष चंद्र बोस जैसे महान व्यक्तित्वों के नेतृत्व सहित भारत के स्वतंत्रता संग्राम को श्रद्धांजलि अर्पित करती है।

प्रधानमंत्री के 2047 तक के विकसित भारत के विज़न का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने “विकास भी, विरासत भी” के मार्गदर्शक सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि विकास और विरासत एक दूसरे के पूरक हैं। संसद के भित्ति चित्र इस दर्शन को मूर्त रूप देते हैं, जो प्रगति को पहचान, मूल्यों और निरंतरता से जोड़ते हैं।

उन्होंने कहा कि सुधा मूर्ति सार्वजनिक जीवन में ज्ञान, विनम्रता और सामाजिक प्रतिबद्धता का एक दुर्लभ संयोजन प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने कॉरपोरेट जगत से सामाजिक सेवा और संसद तक की उनकी यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका योगदान हमेशा व्यापक जनहित से प्रेरित रहा है। उन्होंने प्रकाशन को प्रकाशित करने में लोकसभा सचिवालय के प्रयासों की भी सराहना की।

सुब्रमण्यम भारती का पुनः उल्लेख करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भाषा, क्षेत्र और संस्कृति की विविधता के बावजूद भारत अपने राष्ट्रीय उद्देश्य में एकजुट है। भारत हमेशा से एक रहा है और सदा एक रहेगा। नागरिकों से “राष्ट्र प्रथम” की भावना को अपनाने का आह्वान करते हुए उपराष्ट्रपति ने सभी से प्रतिबद्धता, सत्यनिष्ठा और गौरव के साथ राष्ट्र की सेवा में स्वयं को समर्पित करने का आग्रह किया। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, केंद्रीय मंत्री जे. पी. नड्डा और मनोहर लाल, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश,राज्यसभा सांसद और पुस्तक की लेखिका सुधा मूर्ति इस अवसर पर उपस्थित थीं।