वंदे मातरम कहने के लिए मुसलमानों के साथ जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए: नसीम सिद्दीकी

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मुंबई, 12 फरवरी (आईएएनएस)। एनसीपी (एसपी) के नेता नसीम सिद्दीकी ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम के नए नियमों पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के एतराज पर कहा कि वंदे मातरम कहने के लिए मुसलमानों के साथ जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए।

मुंबई में नसीम सिद्दीकी ने आईएएनएस से बातचीत करते हुए कहा कि अरशद मदनी की भूमिका सही है। यह एक जनतंत्र देश है। आप किसी भी नागरिक को जबरदस्ती कुछ पढ़ने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। राष्ट्रगान तो सभी पढ़ते हैं, लेकिन कुछ ऐसी चीज जो मुसलमानों के एक खुदा होने के वजूद से टकराए या उसे चुनौती दे, मुसलमान एक ही खुदा को मानता है और उसके सामने ही सिर झुकाता है। कोई इस तरह का वाक्य जो अल्लाह के अलावा किसी और के सामने झुकने के लिए प्रेरित करे, वह मुसलमान मंजूर नहीं करेगा। मैं मुसलमानों से यही अपील करूंगा कि इसे कोई बड़ा मुद्दा न बनाएं। जो गाना चाहता है वह गाए, लेकिन किसी के साथ जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए। मुसलमान खड़े होकर सम्मान कर सकता है।

मुंबई की मेयर रितु तावड़े के बयान पर नसीम सिद्दीकी ने कहा कि भाजपा से या रितु तावड़े से या किसी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मेयर से मुसलमानों को कोई सर्टिफिकेट लेने की जरूरत नहीं है। भारतीयों को किसी सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है। सर्टिफिकेट की जरूरत भाजपा के लोगों को है। वे पहले यह सर्टिफिकेट प्राप्त करें कि वे देशभक्त हैं या नहीं। भाजपा छोड़कर इस देश में जितने लोग भी हैं, अलग-अलग राजनीतिक दलों, संप्रदायों और समाजों के, वे सब देशभक्त हैं।

उन्होंने एनसीपी के विलय पर कहा कि मुझे लगता है कि जो बात हुई थी, वह परिवार के अंदर हुई थी, अजित दादा, जयंत पाटिल और शरद पवार साहब के साथ। विलय के लिए दोनों पार्टियों को अपने-अपने कार्यकर्ताओं को बुलाकर राष्ट्रीय कार्यकारिणी में इसकी चर्चा करनी होगी और निर्णय लेना होगा। तभी मर्जर की प्रक्रिया पूरी हो सकती है। शायद यह प्रक्रिया नहीं हुई थी, इसी आधार पर जो अजित दादा गुट के लोग हैं, वे बयान दे रहे हैं कि उनकी नॉलेज में नहीं है, उनके संज्ञान में नहीं है कि इस प्रकार कोई बात हुई थी।

उन्होंने कहा कि हमारी पार्टी के अध्यक्ष पवार साहब ने इस बात को बहुत स्पष्ट रूप से कहा है कि मर्जर की बात हुई थी। 12 तारीख को एलान भी हो सकता था। यदि अजित दादा ज़िंदा होते तो यह संभव हो सकता था, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद परिस्थितियां थोड़ी बदली हुई हैं। उनके दल के नेता लगातार मर्जर का विरोध कर रहे हैं। यदि मर्जर होता तो शायद अजित दादा की जो इच्छा थी वह पूर्ण होती।

नसीम सिद्दीकी ने लातूर जा रहे मुस्लिम शख्स पर ट्रेन में हुए हमले पर कहा कि इस घटना की जितनी निंदा की जाए कम है। यह भाजपा का एजेंडा है। उनके पास विकास का एजेंडा नहीं है इसलिए देश में नफरत की राजनीति के जरिए सत्ता हासिल करना चाहते हैं। यह उसका एक उदाहरण है। यह देश में पहली बार नहीं हुआ है, इससे पहले तबरेज को लोगों ने पेड़ से बांधकर पीटा गया, मारा गया। हद तो तब हो गई जब एक दाढ़ी वाले को ट्रेन में सुरक्षाकर्मी ने गोली मार दी। इस प्रकार की मानसिकता 2014 के बाद युवाओं में विकसित की गई है। सत्ता बदलेगी तो लोगों की मानसिकता बदलेगी।

उन्होंने कहा कि जब से इनकी सत्ता आई है तब से मुसलमान निशाने पर हैं। जहां वो बहुसंख्यक हैं, वहां सुरक्षित हैं, और जहां वो अकेले हैं, जहां वो अल्पसंख्यक हैं, वहां उनके ऊपर इस प्रकार की घटनाएं हो रही हैं। तो यह तो बहुत स्वाभाविक हो गया है इनके राज में, जिस प्रकार से खुलेआम एक समुदाय के लोगों को गाली दी जाती है, उनके कुरान के बारे में, इस्लाम के बारे में, मजहब के बारे में, शाहरुख खान के बारे में। तो मुसलमानों की कुर्बानियों को ये भूल गए हैं या भूलाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि इस देश को आजाद करने में मुसलमानों का बड़ा रोल रहा है। तो इससे मुसलमान पस्त होने वाला नहीं है, हारने वाला नहीं है, वो इनका डटकर मुकाबला करेगा।