यादों में हुसैन: इरफान के कार्टून में प्रधानमंत्री तक पर ‘निशाना,’ ऐसे कलाकार के लिए अखबारों ने किया अनोखा काम

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नई दिल्ली, 28 जनवरी (आईएएनएस)। 1986 का साल था, जब नागपुर से आए इस लड़के ने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में दिग्गज नेता वीपी सिंह का ऐसा कैरिकेचर बनाया कि जूरी दंग रह गई। वह लड़का कोई और नहीं, इरफान हुसैन थे। एक ऐसा कलाकार, जिसकी रेखाएं हंसाती भी थीं और सत्ता के जमीर को कचोटती भी थीं।

किसे पता था कि जिस स्याही से वे लोकतंत्र की रक्षा कर रहे हैं, एक दिन उसी स्याही को उनके ही खून से मिला दिया जाएगा। इरफान हुसैन की कला का दर्शन उनके कॉलम के शीर्षक ‘इन अ लाइन’ में ही छिपा था।

29 जनवरी 1964 को नागपुर में जन्मे इरफान हुसैन उन विरले कलाकारों में से थे, जो मात्र रेखा खींचकर पूरी कहानी कह देते थे। ‘आउटलुक’ पत्रिका के गलियारों में उनकी उपस्थिति एक ठंडी हवा के झोंके की तरह थी। वरिष्ठ संपादक विनोद मेहता उन्हें बहुत मानते थे, क्योंकि इरफान निडर थे।

उन्होंने ‘द हितवाद’, ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ और ‘द पायनियर’ जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में काम किया। वीपी सिंह के कैरिकेचर के लिए उन्हें ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ कार्टून प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार मिला, जिससे वे सुर्खियों में आए थे।

1998 में जब पूरा देश पोखरण परमाणु परीक्षण के जश्न में डूबा था, तब इरफान की कलम ने एक कड़वा सच उकेरा कि बमों की चमक के पीछे आम आदमी की थाली खाली है। उनके कार्टून केवल चित्र नहीं थे, वे ‘पॉलिटिकल थॉट’ थे। चाहे लालू यादव की चुटकी लेनी हो या कट्टरपंथ पर प्रहार करना, इरफान की ‘कला’ ने कभी समझौता नहीं किया।

1999 में होली का खुमार अभी उतरा ही था। 8 मार्च की शाम, इरफान दिल्ली के ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ में अपने साथियों के साथ थे। हंसी-मजाक का दौर चला और रात करीब 11 बजे वे अपनी मारुति कार लेकर साहिबाबाद स्थित अपने घर के लिए निकले।

रात 11:30 बजे, उन्होंने अपनी पत्नी मुनीरा को फोन किया, “बस 15 मिनट में पहुंच रहा हूं।” वे 15 मिनट आज भी खत्म नहीं हुए। मुनीरा पूरी रात दरवाजे की कुंडी की आहट सुनती रहीं, लेकिन वह आहट कभी नहीं आई। अगली सुबह जब गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने पुलिस स्टेशन पहुंचीं, तो पुलिस संवेदनशीलता दिखाने के बजाय ‘क्षेत्राधिकार’ की फाइलों में उलझी रही।

इरफान के गायब होने के तीन दिन बाद, एक खौफनाक मोड़ आया। एक अन्य प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट, परेश नाथ, को फोन आया। दूसरी तरफ से आवाज आई, “हमने इरफान को खत्म कर दिया है। अब अगला नंबर तुम्हारा और सुधीर तैलंग का है। हमारे नेताओं का मजाक उड़ाना बंद करो।” फोन करने वाले ने खुद को एक कट्टरपंथी संगठन का सदस्य बताया।

यह महज ‘कार-जैकिंग’ का मामला नहीं लग रहा था। यह एक सोची-समझी वैचारिक हत्या की बू दे रहा था। 13 मार्च को गाजीपुर के पास नेशनल हाईवे के किनारे एक सुनसान खेत में जो मिला, उसने मानवता को शर्मसार कर दिया। इरफान का शव क्षत-विक्षत था। उनके शरीर पर चाकू के 28 गहरे निशान थे, गला रेता गया था और हाथ-पैर बंधे थे। उनकी पहचान केवल उनके जूतों से हो सकी।

इरफान हुसैन की हत्या के विरोध में दिल्ली के कार्टूनिस्टों ने वह किया जो इतिहास में कभी नहीं हुआ था। अगले दिन देश के तमाम बड़े अखबारों के कार्टून कॉलम ‘खाली’ छोड़ दिए गए। वह कोरा सफेद कागज इस बात का संकेत था कि जब एक कलाकार की आवाज दबाई जाती है, तो लोकतंत्र गूंगा हो जाता है।

इरफान हुसैन के अपहरण मामले में पुलिस ने पांच लोगों को गिरफ्तार किया था। 2006 में सबूतों के अभाव में अदालत ने सभी संदिग्धों को बरी कर दिया। जज ने साफ कहा कि पुलिस यह साबित ही नहीं कर पाई कि इन्हीं लोगों ने अपहरण किया था।

इरफान के बूढ़े पिता मंसूर हुसैन और ‘आउटलुक’ के तत्कालीन संपादक विनोद मेहता ने हाई कोर्ट तक की लड़ाई लड़ी। 2013 में अदालत ने माना कि जांच में भारी खामियां थीं, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। स्याही सूख चुकी थी और गवाह धुंधले पड़ गए थे।

आज भी जब हम अभिव्यक्ति की आजादी की बात करते हैं, तो इरफान हुसैन का चेहरा सामने आ जाता है। उन्होंने धर्म और समाज की सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्र की विसंगतियों पर बात की।