राजु कुमार
भारत में सीवरों और सेप्टिक टैंकों की मैनुअल सफाई कानूनन प्रतिबंधित है, इसके बावजूद सफाई कर्मचारी अपनी जान गंवा रहे हैं। मध्यप्रदेश में पिछले चार सालों में 16 सफाई कर्मचारियों की मौत हुई है, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है। यह सिर्फ एक राज्य की बात नहीं है, बल्कि पूरे देश में सफाई कर्मचारियों की जिंदगी खतरे में है। राष्ट्रीय स्तर पर सफाई कर्मचारियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन सफाई कर्मचारी आंदोलन (एसकेए) ने इन मौतों को लेकर सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। संगठन का कहना है कि जब तक दोषियों को कड़ी सजा नहीं मिलेगी और सफाई कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जाएगी, तब तक यह अमानवीय प्रथा जारी रहेगी।
एसकेए ने सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान हो रही मौतों पर सरकार की चुप्पी के प्रति नाराजगी जाहिर की है। संगठन ने इसे शर्मनाक और दुखद बताते हुए कहा कि गैर-कानूनी होने के बावजूद इंसानों को गटर में उतारकर सफाई करवाई जा रही है। ऐसी परिस्थितियों में सफाई कर्मचारियों की असामयिक मौतें हो रही हैं। एसकेए द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार, अब तक 35 सफाई कर्मचारियों की मौतें दर्ज की गई हैं, जिसे वे हत्या के समान मानते हैं। संगठन ने सरकार से मांग की है कि इन मामलों में त्वरित हस्तक्षेप हो, ताकि न केवल ऐसी मौतों को रोका जा सके बल्कि जिम्मेदारों को भी कड़ी सजा मिले।
मध्यप्रदेश राज्य में एसकेए के संयोजक पवन वाल्मीकि ने कहा कि यह शर्म की बात है कि राज्य के कई जिलों में अब भी शुष्क शौचालय (ड्राई लैट्रीन) मौजूद हैं, जिन्हें साफ करने के लिए दलित महिलाओं को जबरन मैला ढोने के काम में लगाया जाता है, जबकि यह गैर-कानूनी है। सफाई कर्मचारी आंदोलन ने सवाल उठाया कि क्या सफाई कर्मचारियों की जिंदगियों की कोई कीमत नहीं है? मैनुअल स्कैवेंजर एक्ट, 2013 और 2014 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद गटर में इंसानों को उतारना अपराध है, लेकिन इसके बावजूद मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यह अमानवीय प्रथा जारी है।
सरकार की अनदेखी का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि न तो इन घटनाओं में किसी की गिरफ्तारी होती है और न ही मृतकों के परिजनों को कानूनी रूप से मिलने वाला 30 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाता है। वाल्मीकि ने आरोप लगाया कि चूंकि मरने वाले अधिकतर लोग दलित और पिछड़े समाज से आते हैं, इसलिए उनकी जिंदगी सरकार के लिए मायने नहीं रखती।
सफाई कर्मचारी आंदोलन ने इस अमानवीय प्रथा के निरंतर जारी रहने पर चिंता जाहिर की है। संगठन का कहना है कि पिछले 30 वर्षों से मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने और जाति व्यवस्था द्वारा थोपे गए इस अमानवीय कार्य को खत्म करने के लिए संघर्ष किया जा रहा है। इसके बावजूद, सरकार की चुप्पी इस सामाजिक अन्याय को और बढ़ावा दे रही है। यह न केवल जातिगत भेदभाव को मजबूत करता है, बल्कि सफाई कर्मचारियों को अस्पृश्यता और शोषण के चक्र में फंसा देता है।
एसकेए और अन्य संगठनों ने मांग की है कि सरकार अपनी चुप्पी तोड़े और इस जातिगत अत्याचार को खत्म करने के लिए ठोस कदम उठाए। जब तक सफाई कर्मचारियों को उनका हक और सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक यह लड़ाई जारी रहेगी। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दोषियों को कड़ी सजा मिले और सफाई कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए प्रभावी नीतियां लागू हों।