प्रियंका चतुर्वेदी ने जेएनयू विवाद की निंदा की, बोलीं- ऐसी नारेबाजी वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटका देती है

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नई दिल्ली, 7 जनवरी (आईएएनएस)। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) परिसर में लगाए गए विवादित नारों को लेकर प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया है। प्रशासन ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जेएनयू को नफरत की पाठशाला नहीं बनने दिया जाएगा। इस पूरे मामले पर शिवसेना (यूबीटी) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने प्रतिक्रिया देते हुए नारेबाजी की निंदा की। साथ ही उन्होंने छात्रों को लेकर की जा रही व्यापक कार्रवाई और बयानों पर भी सवाल उठाए।

प्रियंका चतुर्वेदी ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि जो नारे लगाए गए हैं, वे पूरी तरह गलत हैं और उनका समर्थन नहीं किया जा सकता। विपक्ष के पास सरकार से जुड़े कई अहम मुद्दे और जनहित से जुड़े सवाल हैं, लेकिन इस तरह की नारेबाजी उन वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटका देती है। प्रियंका चतुर्वेदी के मुताबिक, ऐसे घटनाक्रम भारतीय जनता पार्टी को अपनी जवाबदेही से बचने का एक और मौका दे देते हैं। अगर कानून का उल्लंघन हुआ है तो एफआईआर दर्ज होनी चाहिए और सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए, लेकिन कार्रवाई संतुलित और तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए।

शिवसेना (यूबीटी) सांसद ने छात्रों को लेकर लगाए जा रहे आरोपों पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि छात्रों पर बेबुनियाद आरोप लगाए जा रहे हैं और पूरे विश्वविद्यालय को ‘नफरत की पाठशाला’ कहकर उसकी छवि को धूमिल करना उचित नहीं है। अगर कुछ छात्रों ने गलत नारे लगाए हैं तो कार्रवाई उन्हीं तक सीमित रहनी चाहिए। पूरे छात्र समुदाय या संस्थान को बदनाम करना न तो न्यायसंगत है और न ही लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप।

वहीं, उत्तर प्रदेश में एसआईआर ड्राफ्ट वोटर लिस्ट 2026 के तहत 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर भी प्रियंका चतुर्वेदी ने गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि इस सूची से एक मौजूदा सांसद का नाम तक हटा दिया गया है, जो इस पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि यूपी में एसआईआर के पीछे की मंशा को समझना जरूरी है और यही स्थिति तब भी देखने को मिलेगी, जब महाराष्ट्र में एसआईआर लागू किया जाएगा।

प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि एसआईआर जैसे मुद्दों को एक कानूनी आवश्यकता और आधिकारिक जिम्मेदारी के नाम पर राजनीतिक हथकंडे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया के जरिए विपक्षी दलों के वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं, जिससे उन्हें अपने मताधिकार से वंचित किया जा सके। उन्होंने इसे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि इससे लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होती है। साथ ही उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या चुनाव आयोग देश और प्रदेश के नागरिकों के हित में काम कर रहा है या फिर केवल भारतीय जनता पार्टी के हितों की रक्षा कर रहा है।