मनरेगा की बहाली तक संघर्ष जारी रहेगा: मुख्यमंत्री सिद्धारमैया

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बेंगलुरु, 27 जनवरी (आईएएनएस)। कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार, एआईसीसी महासचिव और कर्नाटक प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला और अन्य प्रमुख नेताओं सहित एक प्रतिनिधिमंडल ने मंगलवार को राज्यपाल थावर चंद गहलोत से मुलाकात की और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) की बहाली की मांग करते हुए एक ज्ञापन सौंपा।

पार्टी विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) (वीबी-जी राम जी) के अधिनियमन का विरोध कर रही है।

इससे पहले, कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (केपीसीसी) की तरफ से बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में आयोजित ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ के तहत एक विशाल विरोध प्रदर्शन और ‘राजभवन चलो’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस दौरान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा कि कांग्रेस पार्टी केंद्र सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध कर रही है और यह आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक वीबी-जी राम जी योजना वापस नहीं ले ली जाती और मनरेगा को पूरी तरह से बहाल नहीं कर दिया जाता।

सिद्धारमैया ने कहा कि भाजपा ने हाल ही में दुर्भावनापूर्ण इरादे से मनरेगा को रद्द कर दिया और उसकी जगह वीबी-जी राम जी योजना लागू कर दी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि मनरेगा अधिनियम 2005 में मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते लागू किया गया था।

उन्होंने कहा कि भोजन का अधिकार, काम का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, सूचना का अधिकार और वन अधिकार अधिनियम, ये सभी जनहितैषी कानून कांग्रेस सरकारों के दौरान लाए गए थे। कांग्रेस ने हमेशा महिलाओं, दलितों, पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों और छोटे किसानों का ध्यान रखा है।

उन्होंने दावा किया कि भाजपा इन जनहितैषी योजनाओं को नष्ट कर रही है और ग्रामीण आबादी को रोजगार से वंचित कर रही है। उन्होंने कहा कि मनरेगा के लगभग 53 प्रतिशत श्रमिक महिलाएं थीं, 28 प्रतिशत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से थे, और लगभग पांच लाख दिव्यांगजन दिहाड़ी मजदूर के रूप में कार्यरत थे। मनरेगा ने सभी के लिए रोजगार सुनिश्चित किया।

सिद्धारमैया ने कहा कि मनरेगा के तहत महिलाएं, दलित, पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यक और छोटे किसान साल के किसी भी दिन काम मांग सकते थे। पहले ग्राम सभाएं और ग्राम पंचायतें काम का स्वरूप तय करती थीं। अब स्थानीय ग्रामीण निकायों के बजाय दिल्ली में ग्रामीण गरीबों के काम का फैसला किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि सभी ग्राम पंचायतें दिहाड़ी मजदूरों को रोजगार के अवसर प्रदान करने में सक्षम नहीं हैं। मनरेगा के तहत श्रमिकों को 100 दिनों के रोजगार की गारंटी दी जाती थी। काम करने का अधिकार गरीबों का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन इसे वीबी ग्राम जी के माध्यम से छीन लिया गया है। पहले, मनरेगा के तहत पूरा खर्च केंद्र सरकार वहन करती थी। अब, अनुदान रोक दिया गया है, और नए कानून के तहत राज्यों को 40 प्रतिशत लागत वहन करनी होगी जबकि केंद्र केवल 60 प्रतिशत का योगदान देगा।

सिद्धारमैया ने कहा कि केंद्र की ऐसी जनविरोधी नीतियों के कारण कई राज्य पीड़ित हैं।