नई दिल्ली, 30 नवंबर (आईएएनएस)। लोककथाओं की भूमि नागालैंड भारत का एक ऐसा हिस्सा है, जहां अनूठे रंग-बिरंगे और पारंपरिक परिधान विरासत को दर्शाते हैं, जबकि प्रकृति इस धरती की अकल्पनीय सुंदरता का प्रतीक है।
नागालैंड भारत के जंगल में जीवन गुजर बसर करने वाले कई नागा कबीला समुदाय के लोगों का घर था। पहले विश्व युद्ध में अंग्रेजों ने बहुत से नागा कबीलों को अपने साथ ले लिया था। बहुत से नागाओं को विश्व युद्ध में फ्रांस और यूरोप भेज दिया। यही नागा जब लौटे तब उन्होंने नागा नेशनलिस्ट मूवमेंट की स्थापना की। 12वीं और 13वीं शताब्दी में नागा लोगों का संबंध असम के सबसे प्रमुख और ताकतवर ट्राइब अहोम के लोगों से हुआ।
नागा कबीलों का इतिहास इस तरह रहा कि उन पर कोई भी कभी अपना राज नहीं चला पाया, चाहे वह असम पर राज करने वाले ‘अहोम किंगडम’ हों, जो यह मानते थे कि उन्होंने नागालैंड के एरिया पर शासन किया था या ब्रिटिश, जिन्होंने इस राज्य की लगभग 90 प्रतिशत आबादी को ईसाई बनाया। लेकिन ईसाई बनाने के बाद भी नागालैंड के लोगों ने अपनी परंपराओं को नहीं छोड़ा। अंग्रेजों ने बड़ी मुश्किल से नागालैंड के इलाकों पर कब्जा किया था। उससे कहीं ज्यादा मुश्किलें ‘नरबली’ परंपराओं को खत्म करने में आईं।
19वीं सदी में जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने पांव पसारने शुरू किए, तब तक नागालैंड पर अहोम राजवंश की सत्ता थी, लेकिन कागज पर भले ही अहोम राजवंश के पास नागालैंड हुआ करता था, असलियत में नागा आजाद थे। अहोम राजवंश ने नागाओं की परंपराओं में कोई हस्तक्षेप नहीं किया, चाहे वह नरबली जैसी परंपरा क्यों न हो। फिर असम भी ब्रिटिश शासन के घेरे में आ गया था। 1944 में दूसरे विश्व युद्ध तक अंग्रेजों और भारतीयों के बीच यह धरती नागा हिल्स त्वेनसांग के नाम से जानी जाती रही। 1 दिसंबर, 1963 को वह दिन था, जब नागालैंड को एक पूर्ण राज्य का दर्जा मिला।
बीरेंद्र कुमार भट्टाचार्य का उपन्यास ‘यारुइंगम’, जो 1950 के दशक में लिखा गया था और 1960 में प्रकाशित हुआ, आत्मनिर्णय के लिए नागा आंदोलन पर केंद्रित था।
‘यारुइंगम’ शब्द का अर्थ है जनता का शासन। उपन्यास ‘यारुइंगम’ नागाओं, विशेष रूप से तंगखुल नागाओं पर आधारित था और 1940 और 1950 के दशक के मध्य के ऐतिहासिक क्षणों को दर्शाता है। लेकिन, यह उपन्यास ‘जनता के शासन’ की प्रारंभिक उत्तर-औपनिवेशिक असमिया साहित्यिक कल्पना के बारे में भी था।
हालांकि, भारत की आजादी के बाद यह राज्य भी अंग्रेजी शासन से मुक्त हुआ। 1957 तक, जिस इलाके को आज हम नागालैंड कहते हैं, वह असम राज्य का सिर्फ एक जिला था, जिसे लोग ‘नागा हिल्स’ के नाम से जानते थे। अगस्त 1957 में अलग-अलग नागा कबीलों के नेताओं ने नागा पीपल्स कन्वेंशन (एनपीसी) बनाया और जुलाई 1960 में, पार्टी का एक डेलीगेशन उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिला और इंडियन यूनियन के अंदर नागाओं के लिए एक अलग राज्य की मांग की, जिसे ‘नागालैंड’ के नाम से जाना जाए। एक 16-पॉइंट एग्रीमेंट हुआ, जिसमें नागालैंड बनाने का प्रावधान था।
4 सितंबर 1962 को नागालैंड बनाने के बिल को प्रेसिडेंट की मंजूरी मिलने के साथ, स्टेट ऑफ नागालैंड एक्ट, 1962 पास हुआ। नागालैंड आधिकारिक तौर पर 1 दिसंबर, 1963 को भारत के 16वें राज्य के रूप में स्थापित हुआ। तब से, हर साल एक दिसंबर को नागालैंड स्थापना दिवस के तौर पर मनाया जाता है।
यह पश्चिम में असम, पूर्व में म्यांमार (बर्मा), उत्तर में अरुणाचल प्रदेश और असम के कुछ भाग व दक्षिण में मणिपुर से घिरा हुआ है। राज्य में 17 प्रशासनिक जिले हैं, जिनमें 17 प्रमुख जनजातियों के साथ-साथ अन्य उप-जनजातियां भी निवास करती हैं। प्रत्येक जनजाति अपने रीति-रिवाजों, भाषा और पहनावे के मामले में एक-दूसरे से अलग है।
नागालैंड को प्रकृति और यहां की सुंदरता पूर्व का स्विट्जरलैंड बना देती है। हरी-भरी पहाड़ियां, हरे-भरे जंगल, शानदार घाटियां, पहाड़, भरपूर पेड़-पौधे और जानवर, नागालैंड के बारे में सोचते ही यही तस्वीर मन में आती है।
इस राज्य पर प्रकृति ने इतनी मेहरबानी की कि यहां के मनोरम दृश्य, रंग-बिरंगे सूर्योदय और सूर्यास्त मन मोह लेते हैं। अगर कोई शहरी जीवन की भागदौड़ से दूर एक शांत जगह की तलाश में है, तो यह उसके लिए एकदम सही माहौल है। साहसिक और निडर लोगों के लिए नागालैंड ट्रैकिंग, रॉक क्लाइम्बिंग, और जंगल कैम्पिंग के लिए एक शानदार स्थान है। इसके हरे-भरे उपोष्णकटिबंधीय वर्षा वनों में असीमित अन्वेषण की संभावनाएं हैं, जो औषधीय पौधों का खजाना भी हैं।




