भोपाल : 29 नवंबर/ रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित विश्वरंग 2025 के तीसरे और अंतिम दिन की शुरुआत आध्यात्मिक शांति और सांस्कृतिक सौहार्द से भरे मंगलाचरण के साथ हुई। मध्यप्रदेश के युवा सितारवादक अनिरुद्ध जोशी ने अपनी मन मोह लेने वाली प्रस्तुति से सभागार को सुरों की पवित्रता से भर दिया। तबला वादक मनोज पाटीदार की संगति ने इस प्रस्तुति को ऊँचाई दी और अंतिम दिन का आरंभ एक शास्त्रीय सांस्कृतिक उत्सव में बदल गया।
‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ की गूंज — सौरभ द्विवेदी का प्रेरक संबोधन
प्रातःकालीन विचार-सत्र में इंडिया टुडे मैगज़ीन और लल्लनटॉप के संपादक सौरभ द्विवेदी ने सीखने की निरंतरता पर गहन विचार रखे। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या मनुष्य वही बनकर रह जाता है जहाँ से आता है? या क्या वह स्वयं को नए सांचों में ढालने की क्षमता रखता है?
उन्होंने ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ और ‘तत्वमसि’ जैसे वेदांत सूत्रों के माध्यम से बताया कि मनुष्य का आंतरिक अस्तित्व व्यापक ब्रह्म चेतना से जुड़ा है।
उन्होंने कहा—“छात्र का मन एक रीते घड़े की तरह है, जिसकी क्षमता ब्लैक होल से भी अधिक है।”
उन्होंने मानव तस्करी का शिकार हुए एक व्यक्ति की दर्दनाक घटना साझा करते हुए संवेदनशीलता, विचारों की विविधता, विज्ञान चेतना और सुनने की आदत को सीखने का मूल बताया। अंत में उन्होंने संदेश दिया कि जीवन का अंत ‘खालीपन’ नहीं बल्कि ‘मुदित भावना’ के साथ होना चाहिए।
अभिनेत्री सान्या मल्होत्रा ने बताया—किरदार को भीतर तक महसूस करने की कला
दोपहर के मुख्य सत्र में प्रसिद्ध अभिनेत्री सान्या मल्होत्रा से संवाद हुआ। डॉ. अदिति चतुर्वेदी वत्स और विकास अवस्थी द्वारा संचालित इस बातचीत में सान्या ने अपने अभिनय-सफर और तैयारी के तरीकों को साझा किया।
उन्होंने बताया कि—
अभिनय उनके लिए “सतत साधना” है।
किसी भी भूमिका को समझने के लिए वे पटकथा को बार-बार लिखती हैं।
किरदारों से जुड़ी जगहों और लोगों से संवाद कर पात्र की गहराई को महसूस करती हैं।
नियमित वर्कशॉप और अभ्यास को उन्होंने कलाकार की परिपक्वता का आधार बताया।
उन्होंने कहा कि संघर्ष और अस्वीकृति कलाकार को मजबूत बनाते हैं, और युवा कलाकारों को सलाह दी कि अभिनय में करियर शुरू करने से पहले शिक्षा पूरी करना बेहद महत्वपूर्ण है।
देवदत्त पटनायक का सत्र: “श्रद्धा नहीं, शंका ज्ञान का द्वार खोलती है”
पौराणिक कथाओं के प्रसिद्ध व्याख्याकार देवदत्त पटनायक ने माइथोलॉजी के भ्रमों और उसकी वास्तविक समझ पर महत्वपूर्ण विचार रखे। उन्होंने कहा—
“मिथ्या का अर्थ झूठ नहीं, बल्कि अधूरा सच है।”
“ज्ञान का द्वार श्रद्धा नहीं, जिज्ञासा खोलती है।”
“शास्त्रार्थ का अर्थ बहस नहीं, अर्थ-खोजना है।”
“यदि शंका नहीं होगी, तो सीखना संभव नहीं। विज्ञान और पौराणिक कथाओं दोनों में प्रश्न जरूरी हैं।”
उन्होंने कहा कि दुनिया की हर संस्कृति की अपनी माइथोलॉजी होती है, जो उसे समझने का माध्यम बनती है।
समानांतर सत्र: समाज, भाषा और मीडिया पर गहन विमर्श
1. मीडिया में छवियों का महाजाल और सामाजिक दृष्टि
अंजनी सभागार में आयोजित इस सत्र में वरिष्ठ पत्रकार सुमित अवस्थी ने पारिवारिक और सामाजिक जीवन पर डिजिटल दुनिया के प्रभाव की चर्चा की।
उन्होंने कहा—
संचार की गति बढ़ी है, पर “मानवीय उपस्थिति” कम हो गई है।
सोशल मीडिया की तीव्रता से भ्रामक सूचनाएँ खतरनाक रूप से बढ़ रही हैं।
पत्रकारिता चाहे जितनी बदले, उसका मूल मिशन “सच से समाज को जोड़ना” है।
सत्र का समापन दर्शकों के सवालों और विचारोत्तेजक टिप्पणियों के साथ हुआ।
2. लुप्तप्राय भाषाएँ: संकट और संरक्षा
आदिरंग सभागार के सत्र में डॉ. स्नेहलता नेगी ने बताया कि भाषा किसी समुदाय की सामूहिक स्मृति और परंपरा होती है।
उन्होंने चिंता व्यक्त की कि—
प्रवास, शहरीकरण और अंग्रेज़ी का बढ़ता दबाव अनेक भाषाओं को समाप्ति की ओर ले जा रहा है।
भाषा के साथ कहानियाँ, लोकगीत, कृषि तकनीकें और जीवनानुभव भी खो जाते हैं।
उन्होंने जनजातीय समुदायों की मौखिक परंपराओं को संरक्षित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
टैगोर बाल कला कार्यशाला: बच्चों की रचनात्मकता का रंगीन संसार
बाल कला कार्यशाला में बच्चों ने क्ले मॉडलिंग, पेंटिंग और प्रिंट मेकिंग में अपनी कल्पनाओं को आकार दिया।
वरिष्ठ कलाकारों नीरज अहिरवार, अशोक भौमिक, महावीर वर्मा, मुकेश बिजौल और दिव्या सिंह ने बच्चों को कला कौशल के साथ-साथ संवेदनशील दृष्टि भी प्रदान की।
यह कार्यशाला बच्चों की आंतरिक रचनात्मकता को उभारने का महत्वपूर्ण मंच बनी।
भाषा प्रौद्योगिकी और भारतीय भाषाओं का भविष्य
अभिमन्यु अनंत मंच पर आयोजित इस सत्र में भाषा-तकनीक के वैश्विक विस्तार पर विशेषज्ञों ने विचार रखा।
मुख्य बिंदु—
अमेरिका के अशोक ओझा: भाषा-शिक्षण में तकनीक क्रांतिकारी बदलाव ला रही है, पर सांस्कृतिक संदर्भ का सही होना जरूरी है।
डॉ. जयशंकर बाबु: डिजिटल साहित्य भाषा संरक्षण का महत्वपूर्ण साधन।
आर्मेनिया की अलिना: हिंदी सीखने से भारतीय संस्कृति की गहराई समझने में मदद मिली।
शिव कुमार: India AI Tool और ‘भाषणी’ भविष्य में भारतीय भाषाओं की वैश्विक उपस्थिति को मजबूत करेंगे।
रविन्द्र कात्यायन: भाषा डेटा सेट की कमी सबसे बड़ी चुनौती है।
‘लेखक से मिलिए’: डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी का व्यंग्य और दृष्टि
शांतिनिकेतन में ‘लेखक से मिलिए’ सत्र में पद्मश्री डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी ने अपने उपन्यास ‘एक तानाशाह की प्रेमकथा’ पर रोचक संवाद किया।
उन्होंने कहा—“लेखन साधना है। जो पीछे मुड़कर देखता है, वह आगे नहीं बढ़ता।”
उनकी हाज़िरजवाबी और व्यंग्य शैली ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
विश्व के नक्शे पर कथेतर साहित्य का महत्व
गौरांजनी सभागार में नॉन-फिक्शन लेखन पर सत्र हुआ।
वैभव सिंह: तथ्य आधारित लेखन आज की दुनिया में सबसे आवश्यक रचना-विधा है।
नीलेश रघुवंशी: नॉन-फिक्शन उन सभी विषयों को समाहित करता है जिनके लिए अन्य विधाओं में जगह नहीं मिलती।
संजय शेफर्ड: इंटरनेट और यात्रा ने कथेतर साहित्य को नया आकार दिया है।
स्त्री अस्मिता और भारतीय विचारिकी
वनमाली सभागार में आयोजित इस महत्वपूर्ण सत्र में
रूबल जी, डॉ. साधना बलवटे, प्रत्यक्षा जी और डॉ. उर्मिला शिरीष ने स्त्री की पहचान, शक्ति, संघर्ष और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य पर विचार रखे।
मुख्य बिंदु—
स्त्री आज अपने आत्मसम्मान के साथ अपनी वैचारिक पहचान भी खोज रही है।
भारतीय चिंतन में स्त्री ऊर्जा का मूल स्रोत मानी गई है।
समय बदलता है, पर स्त्री संघर्ष का मूल स्वर नहीं बदलता।
सत्र का संचालन विशाखा राजूकरराज ने प्रभावी ढंग से किया।समापन
विश्वरंग 2025 का तीसरा दिन केवल सांस्कृतिक विविधता का उत्सव नहीं था, बल्कि विचार, कला, साहित्य, भाषा और तकनीक के अद्भुत संगम का साक्षी भी बना। अंतिम दिन ने प्रतिभागियों को एक समृद्ध अनुभव दिया, जो आने वाले वर्षों में भारतीय सांस्कृतिक जगत को नई ऊर्जा और दिशा देगा।






