नई दिल्ली, 29 अगस्त (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस विपुल पंचोली की नियुक्ति पर विवाद के बीच भारत के 23वें विधि आयोग के सदस्य हितेश जैन ने कुछ पूर्व जजों की आपत्तियों को राजनीति से प्रेरित बताया है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए कुछ चुनिंदा जजों की लॉबी हर मोड़ पर झूठ का राग अलापती रही है।
विधि आयोग के सदस्य हितेश जैन ने शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लंबा-चौड़ा पोस्ट लिखा। उन्होंने जस्टिस अभय ओका के इंटरव्यू का जिक्र करते हुए कहा, “इस बात पर हैरानी नहीं है कि रिटायर्ड जस्टिस सुदर्शन रेड्डी का बचाव करने वाले पूर्व जजों के ग्रुप की ओर से जारी बयान पर उन्होंने (अभय ओका) भी हस्ताक्षर किए थे।”
उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि अधिक से अधिक रिटायर्ड जज खुलेआम राजनीतिक कार्यकर्ताओं की तरह व्यवहार कर रहे हैं। जस्टिस मदन लोकुर से लेकर एस मुरलीधर, संजीब बनर्जी और अब न्यायमूर्ति अभय ओका तक, उनके हस्तक्षेप न्यायिक स्वतंत्रता पर एक सैद्धांतिक रुख के बजाय पक्षपातपूर्ण रुख की ओर बढ़ते जा रहे हैं।
हितेश जैन ने अपनी पोस्ट में लिखा, “न्यायिक स्वतंत्रता प्रेस कॉन्फ्रेंस, इंटरव्यू या पक्षपातपूर्ण पत्रों से सुरक्षित नहीं रहती। यह हमारी जिला अदालतों और मजिस्ट्रेट अदालतों में हर दिन देखी जाती है, जहां लाखों आम नागरिकों के भाग्य का फैसला होता है। ये वही जज हैं, जो अब “लोकतंत्र के संरक्षक” होने का दावा करते हैं, और असल मुद्दों (जैसे निचली अदालतों की स्थिति, नियुक्तियों में देरी और आम नागरिकों को न्याय मिलने की स्थिति) पर स्पष्ट रूप से चुप रहे हैं।
जस्टिस लोकुर और ओका की बात करते हुए, हितैश जैन ने कहा, “वे शायद ही कभी इस बारे में बात करते हैं कि लंबित मामलों को कैसे कम किया जा सकता है, सुनवाई में तेजी कैसे लाई जा सकती है, या आम आदमी के लिए न्याय कैसे सुलभ बनाया जा सकता है।”
सवाल पूछते हुए विधि आयोग के सदस्य ने कहा, “चाहे वह कब्जा विवाद हो, संपत्ति की वसूली हो, मोटर दुर्घटना के दावे हों, या विचाराधीन कैदियों की दुर्दशा हो, पिछले 10 साल में क्या वे न्यायपालिका के सामने आने वाले इन बड़े मुद्दों के समाधान के लिए कोई रचनात्मक समाधान लेकर आगे आए हैं? क्या उन्होंने अपने अनुभव का इस्तेमाल आम वादी की समस्याओं को हल करने के लिए किया है?” जैन ने कहा कि रिकॉर्ड में भाषणों में सिर्फ सामान्य बातों के अलावा कुछ नहीं दिखता।
इस दौरान विधि आयोग के सदस्य हितेश जैन ने कुछ जजों के नामों का जिक्र किया और कहा, “कुछ वकीलों की एक निश्चित सूची है, जो गर्व से खुद को ‘ज्युडिशियल एक्टिविस्ट’ बताते हैं। उनकी दिनचर्या जानी-पहचानी है। जब भी कोई फैसला या न्यायिक पदोन्नति उनकी पसंद के अनुरूप नहीं होती, तो वे मीडिया के पास पहुंच जाते हैं, कहते हैं कि लोकतंत्र खतरे में है।”
हितेश जैन ने आगे कहा, “यह पैटर्न एक दशक से भी ज्यादा समय से दिखाई दे रहा है, जिसे चुनिंदा जजों की लॉबी ने सनसनीखेज इंटरव्यू के जरिए पोर्टल्स पर दोहराया है। हकीकत यह है कि यह लॉबी हर मोड़ पर झूठ का राग अलापती रही है। ये न्यायपालिका के प्रति सच्ची चिंता से नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए है।”
अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा है, “इस पाखंड को उजागर करना और एक स्पष्ट संदेश देना जरूरी है। वे न्यायपालिका को धमका नहीं सकते या पक्षपातपूर्ण उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए इसे ढाल के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकते। अब समय आ गया है कि इस लॉबी को बेनकाब किया जाए।”
इसी क्रम में उन्होंने जस्टिस ओका का नाम लेकर कहा, “वे अब न्यायमूर्ति लोकुर और न्यायमूर्ति मुरलीधर जैसे राजनीतिक कार्यकर्ताओं की कतार में खड़े हैं। ये लोग अब स्वतंत्र आवाज नहीं रहे, बल्कि एक ऐसी लॉबी का हिस्सा बन गए हैं, जिसका एकमात्र उद्देश्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधना लगता है। ऐसे सक्रिय जजों के चेहरे से नकाब हटाना जरूरी है।”