भोपाल : 28 नवंबर/ राजधानी भोपाल में आयोजित विश्वरंग–2025 टैगोर अंतरराष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव के दूसरे दिन का भव्य शुभारंभ मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किया। रवीन्द्र भवन में आयोजित इस समारोह में विश्वरंग के महानिदेशक एवं रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे, विश्वरंग की निदेशक डॉ. अदिति चतुर्वेदी वत्स और सीवीआरयू खंडवा के कुलपति डॉ. अरुण रमेश जोशी मंचासीन रहे। देश–विदेश के सैकड़ों साहित्यकारों, कलाकारों, विद्वानों और युवाओं ने इस महोत्सव में भाग लिया।
भाषा और संस्कृति पर बोले मुख्यमंत्री: “हिन्दी हमारे माथे की बिंदी है”
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने संबोधन में कहा कि भाषा और संस्कृति एक-दूसरे की पूरक और संरक्षक हैं, और इन्हीं से लोक-साहित्य से लेकर वैश्विक साहित्य तक की धारा प्रवाहित होती है। उन्होंने कहा—
“हिन्दी भाषा सच्चे अर्थों में लोकभाषा है। यह हमारी पहचान है, हमारे माथे की बिंदी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आज हिन्दी वैश्विक मंच पर भारत की पहचान बन रही है।”
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति “जियो और जीने दो” की भावना से ओत-प्रोत है, जो आज पूरी दुनिया को आकर्षित कर रही है। मध्यप्रदेश को उन्होंने भारतीय संस्कृति और भाषा चेतना का सशक्त केंद्र बताते हुए कहा कि “भोपाल अब वैश्विक साहित्यिक संवाद का प्रमुख स्थल बन गया है।”
ध्रुपद संगीत की सुरमयी प्रस्तुति से हुआ समारोह का आरंभ
दूसरे दिन का शुभारंभ द्रुपद संस्थान के कलाकारों की मनोहारी प्रस्तुति से हुआ, जिसमें राग भोपाली, राग कलिंद, राग यमन और राग केदार की अद्भुत धुनों ने माहौल को आध्यात्मिक बना दिया।
कार्यक्रम का संचालन विनय उपाध्याय ने किया।
उल्लेखनीय संचालन के लिए उमाकांत गुमदेचा का सम्मान भी किया गया।
एआई युग में भाषा का क्षरण: नंदकिशोर आचार्य–संतोष चौबे का विचारोत्तेजक सत्र
दूसरे दिन का प्रमुख बौद्धिक आकर्षण था—“एआई युग में मनुष्य की चेतना और भाषा का संकट” विषय पर संवाद, जिसमें चिंतक नंदकिशोर आचार्य और विश्वरंग महानिदेशक संतोष चौबे शामिल थे।
संतोष चौबे की चेतावनी:
उन्होंने एआई के खतरे पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा—
“अगर भाषा हमारे हाथ से निकल गई, तो यह समय का सबसे बड़ा संकट होगा। जेनरेटिव एआई हमारे दिमाग को पकड़ रहा है।”
उन्होंने भक्ति आंदोलन पर एआई द्वारा कुछ ही सेकंड में लेख तैयार करने की घटना का उदाहरण देते हुए कहा—
“तकनीक की सहजता कहीं मनुष्य की सोच को शांत न कर दे।”
नंदकिशोर आचार्य का दृष्टिकोण:
आचार्य ने कहा कि तकनीक चाहे जितनी उन्नत हो जाए, निर्णायक शक्ति मनुष्य की चेतना के पास ही है।
“अगर मनुष्य स्वयं सोच रहा है, तो उसे कोई तकनीक विस्थापित नहीं कर सकती।”
दोनों ही वक्ताओं ने बढ़ती हिंसा, भाषा-संकट और सांस्कृतिक चुनौतियों को लेकर गहरी चिंता जताई।
“निर्णय खुद के लिए लें, दूसरों को खुश करने के लिए नहीं” – अंकुर वारिकू
स्टार्टअप गुरु और लोकप्रिय मोटिवेशनल स्पीकर अंकुर वारिकू ने युवाओं के लिए आयोजित “नए कौशल” सत्र को ऊर्जा से भर दिया।
उन्होंने हास्यमिश्रित शैली में कहा—
“पोहा–जलेबी खाकर ही मंच पर आया हूं। भोपाल हर बार मुझे घर जैसा लगता है।”
वारिकू की जीवन यात्रा और सीख
कश्मीर से दिल्ली, दिल्ली से अमेरिका और फिर भारत लौटने की संघर्षपूर्ण यात्रा साझा की।
मिशिगन यूनिवर्सिटी में पढ़ते हुए उन्हें लगा—“मैं जीवित लाश बन रहा था”, इसलिए उन्होंने पीएचडी छोड़ दी।
भारत लौटकर एमबीए किया और पहला स्टार्टअप
secondshaadi.comशुरू किया।उन्होंने कहा—
“मेरी सफलता का राज यही है—मैंने हमेशा खुद की सुनी, दूसरों की नहीं।”
उन्होंने युवाओं को अनुभवों से सीखने, गलतियों से न डरने और स्वयं के निर्णयों पर विश्वास करने की प्रेरणा दी।
हिंदी ने मुझे घर-घर पहुँचाया: आकाश चोपड़ा
दिन के तीसरे मुख्य सत्र में क्रिकेटर और कॉमेंटेटर आकाश चोपड़ा ने कहा—
“हिंदी में बात है, जज़्बात है। उसी ने मुझे लोगों तक पहुँचाया।”
उन्होंने बताया कि कॉमेंटेटर की असली कला यह है कि वह खेल के क्षणों के इमोशन को दर्शकों तक सही तरह पहुंचा सके।
उनकी हालिया किताब पर भी चर्चा हुई।
“संगीत हमें एक अलग दुनिया में ले जाता है” – स्वानंद किरकिरे
गीतकार–कवि स्वानंद किरकिरे ने “शब्दों की दुनिया, ज़िंदगी का संगीत” सत्र में अपने प्रसिद्ध गीतों “बावरा मन” और “बहती हवा सा था वो” के पीछे की संवेदनाएं साझा कीं।
उन्होंने कहा—
“संगीत में वह शक्ति है, जो हमें रोजमर्रा की चिंताओं से दूर ले जाकर मन को शांत और ऊर्जावान बनाती है।”
सांस्कृतिक प्रस्तुति: ‘द कलेक्टिव क्वायर’ ने रचा जादू
दूसरे दिन के सांस्कृतिक कार्यक्रम में गुजरात के प्रसिद्ध क्वायर ग्रुप “द कलेक्टिव क्वायर बाय RK” की प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
14 कलाकारों की विशेष टीम ने वोकल हार्मोनी और विश्व संगीत की अनोखी बुनावट से सभागार में जादुई माहौल बना दिया।
प्रस्तुति के अंत में दर्शकों ने स्टैंडिंग ओवेशन दिया।
समानांतर सत्र: सिनेमा, नाटक, कविता और कला पर गहन विमर्श
दिव्या दत्ता का सिनेमा सत्र
अभिनेत्री दिव्या दत्ता ने एक भावुक कविता पढ़ते हुए महिलाओं के अनुभवों को सामने रखा।
उन्होंने कहा—
“आज की ऑडियंस महिलाओं की उन परतों को भी देखना चाहती है जहाँ वे अकेली, संघर्षरत और संवेदनशील हैं।”
उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी पर खुशी व्यक्त की।
फैज़ल मलिक: संघर्ष और सफलता की कहानी
‘पंचायत’ सीरीज़ के लोकप्रिय अभिनेता फैज़ल मलिक ने बताया कि वह 5–6 साल पहले मुंबई आए और जीवन के कठिन दौर से गुज़रे।
उन्होंने कहा—
“मुंबई खूबसूरत है। अगर कोई टिक गया, तो यहीं बस भी जाता है।”
उन्होंने ‘डबलू–बबलू’ जैसे किरदारों की लोकप्रियता और अभिनय प्रक्रिया पर चर्चा की।
नाटक एवं फिल्मों में सदी के सवाल
अजय ब्रम्हात्मज, अशोक मिश्रा, वामन केंद्रे और राजेंद्र गुप्ता ने नाटक और फिल्मों की वर्तमान चुनौतियों पर चर्चा की।
राजेंद्र गुप्ता ने कहा—
“हिंदी राज्यों में नाटक का स्वरूप सिमट रहा है, लेकिन अच्छी फिल्मों का भविष्य मजबूत है।”
कविता में सदी का सरोकार
विवेक चतुर्वेदी, अच्युतानंद मिश्र और जितेंद्र श्रीवास्तव ने लोकतंत्र, भाषाई संकट और कविता की नई चुनौतियों पर चर्चा की।
जितेंद्र श्रीवास्तव ने कहा—
“भारतीय भाषाएं हाशिए पर जा रही हैं, पाठक घट रहे हैं।”
अशोक भौमिक का कला सत्र: युद्ध-विरोधी चित्रकला
वरिष्ठ चित्रकार अशोक भौमिक ने गोया और पिकासो के चित्रों के माध्यम से युद्ध की त्रासदी को समझाया।
उन्होंने कहा—
“डिजिटल युग में भी कला की भूमिका कम नहीं हुई, बल्कि कलाकारों को नए माध्यम मिले हैं।”
विश्वरंग–2025 का दूसरा दिन साहित्य, कला, संस्कृति, तकनीक और जीवन दर्शन के गहन संवादों से सराबोर रहा।
जहां एक ओर मुख्यमंत्री ने भारतीय भाषा–संस्कृति की शक्ति और समृद्ध परंपरा का संदेश दिया, वहीं मंचों पर नई पीढ़ी, एआई के युग, कला की बदलती परिभाषाओं और जीवन के गहरे सवालों पर विमर्श हुआ।
भोपाल एक बार फिर साबित कर रहा है कि वह राष्ट्रीय–अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक गतिविधियों का जीवंत केंद्र बन चुका है।






