लखनऊ, 1 फरवरी (आईएएनएस)। केंद्रीय बजट 2026 पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। दोनों नेताओं ने अपने एक्स पोस्ट में बजट को आम जनता, गरीबों और बहुजन हितों के प्रति उदासीन बताते हुए मोदी सरकार पर निशाना साधा। अखिलेश यादव ने बजट को भाजपाई बजट करार देते हुए कहा कि इसका असर शेयर मार्केट पर तुरंत दिखा, जहां भारी गिरावट आई।
अखिलेश यादव ने एक्स पोस्ट में लिखा, “आ गया भाजपाई बजट का परिणाम, शेयर मार्केट हुआ धड़ाम। हमने तो पहले ही कहा था… सवाल ये नहीं है कि शेयर बाज़ार रविवार को खुलेगा, सवाल ये है कि और कितना गिरेगा। जब भाजपा सरकार से कोई उम्मीद नहीं है, तो उसके बजट से क्या होगी। हम तो भाजपा के हर बजट को 1/20 (एक बँटे बीस) का बजट मानते हैं क्योंकि वो 5 फीसदी लोगों के लिए होता है। भाजपा का बजट, अपने कमीशन और अपने लोगों को सेट करने का बजट होता है। भाजपा का बजट, भाजपाई भ्रष्टाचार की अदृश्य खाता-बही होता है। इस बजट में न आम जनता का जिक्र है न फिक्र। महंगाई बेतहाशा बढ़ने पर भी इस बजट में जनता को टैक्स में छूट न देना, टैक्स-शोषण है। अमीरों के काम-कारोबार और घूमने-फिरने पर दस तरह की छूटें दी गईं हैं लेकिन बेकारी-बेरोज़गारी से जूझ रहे लोगों की उम्मीदों की थाली, खाली है। निराशाजनक, निंदनीय बजट।”
बसपा सुप्रीमो मायावती ने एक्स पोस्ट में लिखा, “देश के संसद में आज केन्द्र सरकार द्वारा लाये गये बजट में विभिन्न योजनाओं, परियोजनाओं, वादों और आश्वासनों के सम्बन्ध में भविष्य में इनके परिणामों को लेकर यही लगता है कि इनके नाम तो बड़े-बड़े हैं, किन्तु जमीनी स्तर पर इनके दर्शन छोटे ना हों तो बेहतर होगा। इसीलिए सर्वसमाज के हित में केवल बातें ना हों बल्कि इनपर सही नीयत से अमल भी जरूरी है। वैसे तो केन्द्र सरकार का बजट सत्ताधारी पार्टी की नीति व नीयत में चाल, चरित्र व चेहरे का आईना होता है, जिसमें यह झलक मिलती है कि सरकार की सोच वास्तव में गरीब व बहुजन-हितैषी होकर व्यापक देशहित की है या फिर पूँजीवादी सोच की पोषक बड़े-बड़े पूंजीपति व धन्नासेठ समर्थक है।”
उन्होंने आगे कहा, “इतना ही नहीं बल्कि खासकर अपने भारत देश के सन्दर्भ में इस बात का भी विशेष महत्व है कि सरकार की नीति दीर्घकाल में आत्मनिर्भरता की अगर है तो उसके लिए सरकारी क्षेत्र को कितना महत्व देकर परम पूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के कल्याणकारी संविधान के पवित्र मंशा के हिसाब से क्या कार्य किया गया है। और इसी क्रम में संसद में आज पेश बजट को भी देखा जाना चाहिए कि कहीं यह बजट भी आया और गया की तरह परम्परागत रूप से मायूस करने वाला तो नहीं है। और साथ ही यह प्रश्न छोड़ दिया है कि पिछले वर्ष के बजट में सरकार द्वारा किये गये दावे, वादे और आशायें क्या आज पूरी की गई है या एक रस्म को निभा कर रह गयी है। तथा क्या तुलनात्मक रूप में लोगों के जीवन में कोई परिवर्तन आया है। वास्तव में जीडीपी से अधिक लोगों के जीवन में बहु-अपेक्षित विकास व बहु-प्रतीक्षित गुणात्मक परिवर्तन है जो सीधे तौर पर व्यापक जनहित व देशहित से जुडे़ हैं और जिनका आकलन वर्तमान बजट की वाहवाही से पहले जरूर कर लेना है। सरकार भी इस पर कुछ रोशनी डाले तो यह लोगों के अच्छे दिन के लिए अच्छी बात है वरना यह जिम्मेदारी कौन निभाता है।”

