शिमला, 26 फरवरी (आईएएनएस)। हिमाचल प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष राजीव बिंदल ने तीन यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं की कस्टडी को लेकर दिल्ली और हिमाचल प्रदेश पुलिस के बीच टकराव पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि एआई समिट के दौरान भारत की छवि खराब करने के आरोपी यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को हिमाचल सरकार बचा रही है।
दिल्ली पुलिस ने एआई समिट में ‘शर्टलेस प्रदर्शन’ के सिलसिले में शिमला से तीन यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था। जब टीम उन्हें दिल्ली ला रही थी, तब शिमला पुलिस के साथ टकराव की स्थिति बनी। शिमला में दिल्ली पुलिस के अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज कर ली गई।
भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष राजीव बिंदल ने कहा कि पिछले 24 घंटों में जो कुछ हुआ है, वह राज्य के इतिहास में कभी नहीं हुआ। उन्होंने हिमाचल सरकार पर आरोपियों को बचाने का आरोप लगाया। राजीव बिंदल ने कहा, “कानूनी प्रक्रिया अपनाने के बजाय सरकार ने कानूनी गिरफ्तारी करने आई दिल्ली पुलिस टीम के खिलाफ एफआईआर दर्ज करके कानून लागू करने वाली एजेंसियों के बीच टकराव पैदा कर दिया।”
बिंदल ने बताया कि दिल्ली पुलिस कोर्ट के आदेशों समेत कानूनी प्रक्रिया के तहत हिमाचल प्रदेश आई थी। हालांकि, हिमाचल पुलिस ने कथित तौर पर दिल्ली पुलिस कर्मियों के खिलाफ अपहरण का मामला दर्ज किया और उनकी कार्रवाई में बाधा डाली। बिंदल ने कहा, “जब कोई राज्य सरकार राजनीतिक हितों के लिए एक पुलिस बल को दूसरे के खिलाफ खड़ा करती है, तो यह संवैधानिक शासन के लिए खतरे को दर्शाता है।”
उन्होंने कहा कि पिछले तीन सालों में हिमाचल प्रदेश में कानून-व्यवस्था काफी खराब हो गई है। उन्होंने हाल की घटनाओं का हवाला दिया, जिसमें नालागढ़ में संदिग्ध मौत, चंबा में एक वन अधिकारी पर हमला, मंडी में प्रशासनिक अधिकारियों पर हमले, बिलासपुर और ऊना में गोलीबारी की घटनाएं और एक दलित नाबालिग की बेरहमी से हत्या शामिल है।
बिंदल ने ऊना शहर में मीडिया से कहा, “इन सभी गंभीर मामलों में सरकार ने उदासीनता दिखाई है। लेकिन जब देश को बदनाम करने के आरोपियों को बचाने की बात आती है, तो पूरी मशीनरी हाइपरएक्टिव हो जाती है।”
हिमाचल के भाजपा प्रमुख ने सरकार पर संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने का भी आरोप लगाया।
पंचायती राज चुनावों का जिक्र करते हुए, उन्होंने कहा कि राज्य चुनाव आयोग की समय सारिणी के बावजूद सरकार ने कथित तौर पर अधिकारियों को उस पर काम न करने का निर्देश दिया। उन्होंने इसे एक संवैधानिक संकट बताया और पैसे की तंगी का दावा करते हुए ऊपरी अदालतों में चुनाव आयोग के खिलाफ कानूनी लड़ाई में करोड़ों रुपए खर्च करने के लिए सरकार की आलोचना की।

