36 के बालेन शाह: ‘आउटसाइडर’ से ‘आर्किटेक्ट’ तक, क्या नेपाल दोहराएगा सिंगापुर मॉडल?

0
11

नई दिल्ली, 27 अप्रैल (आईएएनएस)। नेपाल के युवा प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह यानी बालेन शाह सोमवार को 36 साल के हो गए। 27 का अंक उनके लिए खास है। ठीक एक महीने पहले, यानी 27 मार्च 2026 को, उन्होंने बतौर प्रधानमंत्री पद संभाला था। इस एक महीने में उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक सुधार की कोशिशों के तहत ताबड़तोड़ फैसले लिए। इनमें से कुछ पर शाबाशी मिली तो कई सवालों के घेरे में भी हैं। शाह की कार्यशैली की तुलना सिंगापुर के संस्थापक ली कुआन यू से की जाने लगी है। दोनों के निर्णयों में काफी समानता जो है!

ली ने सत्ता संभाली तो वो मात्र 36 बरस के थे वहीं शाह ने भी 35 साल की उम्र में पीएम पद की कमान संभाली। दोनों नेताओं की सबसे बड़ी समानता उनकी “आउटसाइडर” छवि में देखी जाती है। ली कुआन यू ने औपनिवेशिक दौर के अंत में एक नए राजनीतिक ढांचे के साथ सत्ता में प्रवेश किया, जबकि बालेन शाह ने स्थापित दलों से अलग हटकर अपनी पहचान बनाई। नेपाल में पारंपरिक दलों—जैसे नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल—के बीच लंबे समय से चल रही प्रतिस्पर्धा के बीच शाह का उभार एक वैकल्पिक राजनीति का संकेत देता है।

शासन के स्तर पर, ली कुआन यू का मॉडल सख्त प्रशासन, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, और तेज निर्णय प्रक्रिया के लिए जाना जाता है। इसी तरह, बालेन शाह के सुधारवादी कदमों की तारीफ तो हो रही है, लेकिन कुछ खतरे भी पैदा हो रहे हैं।

वीआईपी संस्कृति पर रोक, लालफीताशाही पर नकेल, सरकारी कर्मचारियों को 15-15 दिनों में वेतन, 1990 के बाद अर्जित की गई अवैध/अज्ञात संपत्ति की जांच, पूर्व पीएम केपी ओली की करप्शन के आरोप में गिरफ्तारी, अफसरों को आदेश कि वे सरकारी विद्यालयों में बच्चे पढ़ाएं, और विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति पर रोक समेत कई ऐसे चौंकाने वाले फैसले हैं जिन्हें शाबाशी मिल रही है तो भौंहे भी तन रही हैं। ली के सुधारवादी कदमों ने भी लोगों में आशंकाएं पैदा की थीं। सिंगापुर मॉडल की तब धूम थी, तो अब नेपाल के संदर्भ में फिर उसका जिक्र छिड़ गया है।

वैश्विक स्तर पर भी यह तुलना ध्यान आकर्षित कर रही है। विकासशील देशों में जहां संस्थागत कमजोरी एक बड़ी चुनौती है, वहां बालेन शाह जैसे नेता को एक संभावित “रिफॉर्मर” के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सुधारों के साथ पारदर्शिता, संवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों को संतुलित रखा जाए।

हालांकि, दोनों के बीच अंतर भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। सिंगापुर एक छोटा, केंद्रीकृत शहर-राज्य है, जबकि नेपाल एक बहुदलीय, संघीय लोकतंत्र है। यहां सत्ता संतुलन, प्रांतीय हित और राजनीतिक गठबंधन—तीनों को साधना पड़ता है। ऐसे में सिंगापुर जैसा मॉडल सीधे लागू करना न तो आसान है और न ही पूरी तरह संभव।

राजनीतिक प्रभाव के स्तर पर, बालेन शाह का उदय नेपाल में स्वतंत्र और गैर-पारंपरिक नेतृत्व को वैधता देता है। इससे पारंपरिक दलों पर दबाव बढ़ सकता है कि वे अपनी कार्यशैली में सुधार करें। वहीं, यदि उनके सख्त फैसले जनविरोध का कारण बनते हैं, तो यह प्रयोग सीमित भी हो सकता है।

सिंगापुर के संस्थापक प्रधानमंत्री ली को आधुनिक एशिया के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है। एक छोटे, संसाधन-विहीन द्वीप को वैश्विक आर्थिक केंद्र में बदलने की उनकी कहानी अक्सर “आउटसाइडर लीडरशिप” और सख्त प्रशासनिक मॉडल के उदाहरण के रूप में पेश की जाती है।

ली कुआन यू के जीवन और नीतियों को समझने के लिए उनकी आत्मकथा ‘फ्रॉम थर्ड वर्ल्ड टू फर्स्ट’ एक महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती है। इस किताब में उन्होंने विस्तार से बताया है कि कैसे सिंगापुर ने औपनिवेशिक अतीत, बेरोजगारी, जातीय तनाव और सीमित संसाधनों जैसी चुनौतियों से निकलकर खुद को एक विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित किया।

ली कुआन यू का उदय ऐसे समय में हुआ जब सिंगापुर ब्रिटिश शासन से बाहर निकलकर (1965) अपनी राजनीतिक दिशा तय कर रहा था। इससे छह साल पहले यानी 1959 में वो प्रधानमंत्री बने। उन्होंने पीपुल एक्शन पार्टी के माध्यम से एक संगठित और अनुशासित राजनीतिक ढांचा तैयार किया। उनका फोकस स्पष्ट था—कानून का सख्त पालन, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और योग्यता आधारित प्रशासन।

उनकी नीतियों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू “मेरिटोक्रेसी” यानी योग्यता पर आधारित व्यवस्था था। सरकारी तंत्र में भर्ती और पदोन्नति को क्षमता से जोड़ना, शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना और विदेशी निवेश को आकर्षित करना—इन सभी कदमों ने सिंगापुर की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी। इसके साथ ही, उन्होंने शहरी नियोजन, स्वच्छता और सार्वजनिक सेवाओं में उच्च मानक स्थापित किए, जो आज भी सिंगापुर की पहचान हैं। उन्होंने जब कमान संभाली तो सिंगापुर की तीन चौथाई आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही थी और पीने का साफ पानी भी उनके पास नहीं था।

हालांकि, उनकी शासन शैली पर आलोचनाएं भी हुईं। सख्त कानून और सीमित राजनीतिक विरोध ने सिंगापुर में लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं को सीमित किया। मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नियंत्रण को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। इसके बावजूद, समर्थकों का तर्क है कि उस दौर में स्थिरता और विकास के लिए यह मॉडल प्रभावी साबित हुआ। 31 साल तक उन्होंने सिंगापुर पर राज किया। इस दौरान विरोधियों का सफाया हुआ और मीडिया की स्वतंत्रता पर भी नकेल कसी गई। इस तरह उनको एक नया नाम मिला “सॉफ्ट डिक्टेटर” या “सॉफ्ट ऑथोरिटेरियन”।

महज एक महीने में बालेन शाह को जज करना तर्कसंगत नहीं है। लेकिन इस बीच उनके कुछ फैसले सवालों के घेरे में जरूर आ गए हैं। इन दिनों सबसे ज्यादा नाराजगी भंसार नियम को लेकर है। ‘भंसार’ यानी कस्टम ड्यूटी, उन सामानों पर लगती है जो भारत से नेपाल पहुंच रहे हैं। इसके मुताबिक, 100 रुपए से ऊपर का कोई भी सामान सीमा पार ले जाने पर कस्टम ड्यूटी 5 से 80 फीसदी तक लगना तय है। सोच ये थी कि अर्थव्यवस्था को बल मिले और नेपाली मार्केट आत्मनिर्भर बने, लेकिन फिलहाल सीमाई इलाकों में असंतोष जरूर बढ़ रहा है। सामानों की कीमतें बढ़ रही हैं और व्यापारियों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।

सिंगापुर की कहानी एक दिन में नहीं बदली, बरसों बरस लगे। सालों का अथक प्रयास और जीडीपी जो पहले 516 डॉलर के करीब थी, 2026 में 1 लाख डॉलर के पार पहुंच गई है। यह सबक भी है और हिदायत भी कि बदलाव तत्काल नहीं होता, बल्कि समय के साथ स्वतः हो जाता है। सिंगापुर मॉडल में ऐसा बहुत कुछ है जो सीखने लायक है तो ठिठक कर सोचने पर मजबूर भी करता है।