यादों में गुलाम मुस्तफा खान: लता से रहमान तक, उस्ताद के सुरों में ढली पीढ़ियां

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नई दिल्ली, 2 मार्च (आईएएनएस)। कुछ आवाजें सिर्फ सुनी नहीं जातीं, महसूस की जाती हैं। गुलाम मुस्तफा खान की आवाज ऐसी ही थी गहरी, सधी हुई और रूह तक उतर जाने वाली। 3 मार्च 1931 को बदायूं में जन्मे इस फनकार के हिस्से में संगीत जैसे जन्म से पहले ही लिख दिया गया था।

रामपुर-सहसवान घराने की सख्त तालीम, पिता उस्ताद वारिस हुसैन खान का फौजी अनुशासन और घंटों का ‘खरज’ (मंद्र सप्तक) रियाज इन सबने मिलकर उनके सुरों को वह ताकत दे दी थी, जो साढ़े तीन सप्तकों तक बेखौफ घूम आती थी।

खान साहब का मानना था कि सुर सिर्फ तकनीक से नहीं, तपस्या से खुलते हैं। वे कहा करते थे, “रियाज इबादत है।” जब दूसरे बच्चे खेलते थे, तब वे सुबह-सुबह मंद सप्तक में सुर साधते थे। यही वजह है कि उनकी गायकी में ध्रुपद की गंभीरता भी थी और खयाल की उड़ान भी। ‘नोम-तोम’ का लाप हो या सपाट तानें, सबमें एक नफासत और एक ठहराव झलकता था जो सीधे दिल को छू ले।

शास्त्रीय संगीत की दुनिया में अक्सर यह हिचक रहती थी कि फिल्मों में गाना चाहिए या नहीं, लेकिन खान साहब ने इस दीवार को गिराया। 1981 की फिल्म उमराव जान में उनकी गाई ‘रागमाला’ आज भी संगीत प्रेमियों के लिए एक पाठशाला है। जब वे “प्रथम धर ध्यान…” से “दर्शन देहो शंकर महादेव…” तक रागों की माला पिरोते हैं, तो लगता है जैसे समय ठहर गया हो। संगीतकार खय्याम और निर्देशक मुजफ्फर अली अक्सर कहते थे कि उस दौर की आत्मा खान साहब की आवाज में बसती थी।

उनकी सबसे बड़ी पहचान सिर्फ मंच की तालियों से नहीं बनी, वह बनी उनके शिष्यों से। वे ‘वॉइस कल्चर’ के ऐसे उस्ताद थे, जिनके पास गले की हर बारीकी का जवाब होता था। सुर कहां टिकेगा, सांस कहां बदलेगी, शब्द कैसे खुलेंगे यह सब वे बड़ी सादगी से समझाते थे। यही वजह है कि लता मंगेशकर और आशा भोसले जैसी महान गायिकाएं भी उनसे सलाह लेने में संकोच नहीं करती थीं। यह उनकी विद्वता का प्रमाण था कि दिग्गज भी उनसे सीखने को तैयार रहते।

नई पीढ़ी के संगीतकारों पर भी उनका गहरा असर रहा। ए. आर. रहमान ने उनके सान्निध्य में बैठकर शास्त्रीय संगीत की बारीकियां समझीं। रहमान अक्सर कहते हैं कि खान साहब ने उन्हें सुरों की आत्मा से मिलवाया। सोनू निगम तो उन्हें अपना ‘आध्यात्मिक पिता’ मानते हैं। सोनू कई मंचों पर भावुक होकर कह चुके हैं, “उन्होंने मुझे सिर्फ गाना नहीं, सुर को महसूस करना सिखाया।” हरिहरन की गजलों में जो ठहराव और मिठास है, उसमें भी खान साहब की तालीम की झलक मिलती है।

खान साहब सिर्फ परंपरा के रक्षक नहीं थे, वे खोजी भी थे। उन्होंने भारतीय संगीत की 22 श्रुतियों को अपनी आवाज से जीवंत किया। उनके गाए सूक्ष्म स्वर-अंतराल आज भी संगीत के छात्रों के लिए अध्ययन का विषय हैं। वे मानते थे कि संगीत विज्ञान भी है और साधना भी, दोनों का संतुलन ही कलाकार को मुकम्मल बनाता है।

सरकार ने उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित किया, लेकिन उनके लिए असली सम्मान शिष्यों की कामयाबी और श्रोताओं की ‘दाद’ थी। चाहे विदेशों में प्रस्तुति हो या देश के छोटे शहरों का मंच, उन्होंने हर जगह अपनी भारतीयता और रामपुर की तहजीब को साथ रखा।

17 जनवरी 2021 को मुंबई में जब उन्होंने आखिरी सांस ली, तो संगीत जगत में एक गहरी खामोशी छा गई, लेकिन सच यह है कि ऐसे कलाकार कभी जाते नहीं। वे अपने सुरों, अपनी तालीम और अपनी विरासत में जिंदा रहते हैं।