खूबसूरत ही नहीं रहस्यों से भी भरा है ‘पामुक्कले’, जानें क्यों कहा जाता है ‘नरक का द्वार’

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नई दिल्ली, 24 मार्च (आईएएनएस)। दुनिया में ऐसी जगहें हैं जो न केवल खूबसूरत बल्कि रहस्यों से भी भरपूर है। ऐसी ही जगह तुर्की के पश्चिमी हिस्से में स्थित पामुक्कले है, जिसे दुनिया के सबसे अनोखे और खूबसूरत प्राकृतिक स्थलों में से एक माना जाता है। यहां सफेद चमकती ट्रैवर्टाइन की सीढ़ियां और थर्मल पूल यानी गर्म पानी के तालाब भी हैं, जिसे देखने के लिए हर साल बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं।

खास बात है कि दूर से देखने पर यह जगह कॉटन की ढेर जैसी लगती है। इस वजह से इस जगह को ‘कपास का महल’ भी कहा जाता है। पामुक्कले की ये सफेद सीढ़ियां और पूल ज्वालामुखी गतिविधि से निकलने वाले गर्म पानी के कारण बने हैं। बारिश का पानी जमीन की दरारों से नीचे जाता है, जहां मैग्मा से गर्म होकर यह चूना पत्थर की चट्टानों से खनिज घोल लेता है। सतह पर आने पर ये खनिज जम जाते हैं और ट्रैवर्टाइन चट्टान बनाते हैं।

ज्वालामुखी गतिविधि के कारण निकलने वाले गर्म झरनों की वजह से यहां कार्बन डाइऑक्साइड एक गुफा में जमा होता गया, जिसे प्राचीन काल में प्लूटो (मृत्यु के देवता) का द्वार माना जाता था। इस गुफा में घुसने वाले जानवर या इंसान अक्सर तुरंत मर जाते थे। इस वजह से इस जगह को ‘नरक का द्वार’ भी कहा जाता है।

यहां पानी का तापमान 19 से 57 डिग्री सेल्सियस तक रहता है। इन थर्मल पूलों के ठीक ऊपर प्राचीन ग्रीको-रोमन शहर हिएरापोलिस बसा था। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में बने इस शहर को यूनेस्को ने साल 1988 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था। पास में ही क्लियोपेट्रा पूल है, जहां टूटे खंभों के बीच लोग तैर सकते हैं। सातवीं शताब्दी में आए भूकंप ने शहर को काफी नुकसान पहुंचाया था।

अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के टेरा उपग्रह पर लगे एस्टर सेंसर ने 25 मई 2021 और 9 अक्टूबर 2021 को इन जगहों की तस्वीरें ली थीं। एस्टर पृथ्वी की सतह के तापमान, ग्लेशियरों, ज्वालामुखियों और पर्यावरणीय बदलावों का अध्ययन करने में मदद करता है।

पामुक्कले क्षेत्र में ट्रैवर्टाइन का जमाव कम से कम 6 लाख वर्षों से यानी प्लाइस्टोसीन युग से चल रहा है। हालांकि, इस जगह पर अधिकांश सफेद चट्टानों का निर्माण पिछले 50 हजार वर्षों के अंदर हुआ है। शोधकर्ताओं का मानना है कि आज जो गर्म पानी के झरने और ट्रैवर्टाइन पूल हम देखते हैं, उनकी वर्तमान व्यवस्था सातवीं शताब्दी में आए लाओडिकिया भूकंप के बाद बनी थी। इस भूकंप ने इलाके की भू-संरचना को बदल दिया, जिसके कारण गर्म पानी की धाराएं नई राहों से बहने लगीं और ट्रैवर्टाइन का निर्माण तेजी से शुरू हुआ।

समय के साथ इस क्षेत्र का तापमान भी बदलता रहा है। अधिक गर्म पानी वाले झरनों से कैल्साइट ट्रैवर्टाइन बनता है, जबकि कम तापमान पर अधिक छिद्रपूर्ण टूफा जमाव होता है। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए भू-रासायनिक विश्लेषणों से पता चलता है कि प्लाइस्टोसीन युग के बाद पानी का तापमान धीरे-धीरे कम हुआ है।