Sunday, June 14, 2026
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असम चुनाव में हेमंत सोरेन की एंट्री, ‘टी-ट्राइब’ के साथ सामाजिक समीकरणों पर फोकस

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रांची/गुवाहाटी, 29 मार्च (आईएएनएस)। झारखंड की सत्तारूढ़ पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने असम विधानसभा चुनाव में पहली बार 18 सीटों पर उम्मीदवार उतारकर पूर्वोत्तर की राजनीति में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश तेज कर दी है।

पार्टी प्रमुख और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद चुनावी अभियान की कमान संभाले हुए हैं और राज्य में कैंपेन कर लगातार जनसभाएं कर रहे हैं। उनकी सभाओं में उमड़ रही भीड़ को लेकर पार्टी उत्साहित है और इसे अपने विस्तार अभियान के सकारात्मक संकेत के तौर पर देख रही है।

करीब पांच दशक के अपने राजनीतिक इतिहास में यह पहला अवसर है, जब झामुमो झारखंड की सीमाओं से बाहर किसी राज्य में इस स्तर पर चुनावी मैदान में उतरा है। पार्टी ने असम की उन सीटों को चुना है, जहां झारखंड मूल के आदिवासियों और कुड़मी समुदाय की उल्लेखनीय उपस्थिति है।

आंकड़ों के मुताबिक, असम में चाय बागानों से जुड़े झारखंडी मूल के ‘टी-ट्राइब’ समुदाय की आबादी करीब 70 लाख है। इन समुदायों को अब तक अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं मिल पाया है। हेमंत सोरेन अपने चुनावी अभियान में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठा रहे हैं और इन समुदायों को आदिवासी का दर्जा दिलाने का भरोसा जता रहे हैं।

झामुमो की रणनीति राज्य के सामाजिक समीकरणों पर केंद्रित है। पार्टी मुस्लिम, कुड़मी, आदिवासी और ईसाई मतदाताओं के गठजोड़ के जरिए एक नए राजनीतिक आधार के निर्माण की कोशिश कर रही है। झारखंड में इसी तरह के सामाजिक समीकरण ने पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई थी। संगठनात्मक स्तर पर भी पार्टी ने इस चुनाव को लेकर व्यापक तैयारी की है।

महासचिव विनोद पांडेय के नेतृत्व में पिछले एक वर्ष से जमीनी स्तर पर काम किया जा रहा है। पार्टी ने 20 स्टार प्रचारकों की सूची जारी की है, जबकि कई मंत्री और विधायक पहले से असम में सक्रिय हैं। स्थानीय मुद्दों को केंद्र में रखकर प्रचार अभियान को धार दी जा रही है। हालांकि, असम जैसे जटिल सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में किसी नए दल के लिए राजनीतिक जमीन तैयार करना आसान नहीं माना जाता। यहां पहले से मजबूत क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों की मौजूदगी झामुमो के सामने बड़ी चुनौती है।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि पार्टी का सामाजिक समीकरण सीमित स्तर पर भी असर डालता है, तो उसे शुरुआती सफलता मिल सकती है। इसके वास्तविक प्रभाव का आकलन चुनाव परिणामों के बाद ही संभव होगा।