गांधीनगर, 19 अप्रैल (आईएएनएस)। मेहसाणा के एक युवा वैज्ञानिक हर्षिल दवे ने मेडिकल साइंस के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। आईआईटी गांधीनगर में रिसर्च स्कॉलर हर्षिल ने एक ऐसी हाइड्रोजेल बेस्ड तकनीक विकसित की है, जो कोलन ट्यूमर की सर्जरी को ज्यादा सुरक्षित और आसान बना सकती है। यह हाइड्रोजेल-बेस्ड टेक्नोलॉजी, कोलोरेक्टल पॉलिप्स यानी कैंसर में बदलने की संभावना वाले ट्यूमर की सर्जरी में मदद करता है।
रिसर्च स्कॉलर हर्षिल ने बताया कि हमारे बनाए इस हाइड्रोजेल में एक खास शियर-थिनिंग प्रॉपर्टी है, जिसका मतलब है कि जब इस पर प्रेशर या फोर्स लगाया जाता है तो यह लिक्विड बन जाता है और फिर फोर्स हटाने पर वापस सॉलिड (जेल) फॉर्म में बदल जाता है। इस प्रॉपर्टी की वजह से डॉक्टर इसे आसानी से एक लंबे कैथेटर या एंडोस्कोप के जरिए इंजेक्ट कर सकते हैं। इंजेक्शन के बाद यह सब्सटेंस ट्यूमर के नीचे एक कुशन बनाता है, जिससे डॉक्टर को उस टिशू को आसानी से उठाने में मदद मिलती है और उसे ज्यादा एक्यूरेसी के साथ निकालने में मदद मिलती है।
आमतौर पर एंडोस्कोपिक सर्जरी के दौरान कोलन ट्यूमर के नीचे सलाइन या डेक्सट्रोज डाला जाता है, जिससे ट्यूमर उभर जाए, लेकिन यह लिक्विड जल्दी खत्म हो जाता है। वहीं इस नई हाइड्रोजेल बेस्ड टेक्नोलॉजी से ट्यूमर सॉलिड बन जाता है, जिससे सर्जरी में आसानी होती है।
आईआईटी गांधीनगर के बायोलॉजिकल साइंसेज एंड इंजीनियर डिपार्टमेंट के असिस्टेंट प्रोफेसर मुकेश डंका ने बताया कि हर्षिल दवे मेरे लैब के पीएचडी विद्यार्थी हैं। हर्षिल ने इसकी खोज तीन वर्ष पहले शुरू की थी। हमने प्लांट से डीजीएमएस मॉलिक्यूल को मंगाया। हमने इसको पानी में डालकर इस प्रॉपर्टीज चेक की तो देखा कि ये एक नैनो फाइब्रस हाइड्रोजन बना रहा है। हर्षिल ने इसके ऊपर काम शुरू किया। हमने देखा कि जब हम इंजेक्शन का फोर्स लगाते हैं तो लिक्विड बन जाता है और जैसे ही बॉडी में इंजेक्ट करते हैं सॉलिड बन जाता है।
उन्होंने बताया कि हमारे जीआईटी ट्रैक में कैंसर के छोटे-छोटे ट्यूमर हो जाते हैं। हमने सोचा कि एंडोस्कोपी के माध्यम से उसको इंजेक्ट कर सकते हैं और उन ट्यूमर को निकालने, सर्जिकली रिमूव करने में काम आ सकता है। इस मॉलिक्यूल में बहुत सारी दवाइयां लोड कर सकते हैं। यह तकनीक एंडोस्कोपी के लिए इंजेक्टेबल हाइट्रोजल टेक्नोलॉजी है।
बता दें कि हर्षिल दवे की इस रिसर्च को एक प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित किया गया है, साथ ही उन्हें इस शोध के लिए ‘विक्रम साराभाई यंग साइंटिस्ट अवॉर्ड 2026’ से भी सम्मानित किया गया है। फिलहाल, इस टेक्नोलॉजी का प्री-क्लिनिकल ट्रायल और बड़े जानवरों पर सफल परीक्षण किया जा चुका है, साथ ही इसे भारतीय पेटेंट भी मिल चुका है। अब इस तकनीक को क्लिनिकल ट्रायल्स में ले जाने की तैयारी की जा रही है, ताकि भविष्य में कोलन कैंसर के इलाज में इसका व्यापक उपयोग हो सके।

