भविष्य में 3डी प्रिंटिंग से सही हो सकेंगी लोगों की टूटी हुई हड्डियां व क्षतिग्रस्त कार्टिलेज

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नई दिल्ली, 20 अप्रैल (आईएएनएस)। भारत के एक प्रमुख तकनीकी शिक्षण संस्थान ने ऐसी नई तकनीक विकसित की है, जो भविष्य में टूटी हड्डियों और क्षतिग्रस्त कार्टिलेज (उपास्थि) के इलाज का तरीका बदल सकती है। शोध टीम ने टिश्यू इंजीनियरिंग या टिश्यू जैसी संरचनाओं की 3डी प्रिंटिंग की तकनीक विकसित की है। इसके लिए एक उन्नत ‘बायो-इंक’ तैयार की गई है और इसका पेटेंट भी हासिल कर लिया गया है। यह उपलब्धि एनआईटी राउरकेला के शोधकर्ताओं ने हासिल की है।

सरल शब्दों में कहें तो बायो-इंक, यानी एक खास तरह की जैविक स्याही, विकसित की गई है। इसका उपयोग 3डी प्रिंटर के जरिए शरीर के अंदर के टिश्यू जैसे ढांचे बनाने में किया जाता है। अब तक सबसे बड़ी समस्या यह थी कि ऐसी स्याही मिलना मुश्किल था जो मजबूत भी हो, मानव शरीर के अनुकूल भी हो और प्रिंटिंग में आसानी से काम भी करे।

इस नई खोज ने इसी कमी को दूर करने की दिशा में बड़ी भूमिका निभाई है। यह खोज पुनर्योजी चिकित्सा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। यदि आगे के परीक्षण सफल रहते हैं तो आने वाले समय में 3डी प्रिंटिंग के जरिए हड्डी और कार्टिलेज की मरम्मत करना आसान और अधिक सुलभ हो सकता है। इस शोध का नेतृत्व प्रो. देवेंद्र वर्मा ने किया, जिनके साथ शोधार्थी श्रेया चरंगू और डॉ. तन्मय भरद्वाज भी शामिल रहे।

टीम ने प्रोटीन और प्राकृतिक शर्करा (पॉलीसैकराइड) को मिलाकर एक विशेष बायो-इंक बनाया। यह न केवल प्रिंटिंग के दौरान अपनी संरचना बनाए रखता है, बल्कि कोशिकाओं की वृद्धि में भी मदद करता है। इस बायो-इंक को तैयार करने के लिए बोवाइन सीरम एल्ब्यूमिन, सोडियम एल्गिनेट, जिलेटिन और काइटोसान जैसे पदार्थों का मिश्रण किया गया। यह मिश्रण शरीर के टिश्यू के बाहरी ढांचे जैसा वातावरण तैयार करता है, जिससे कोशिकाएं आसानी से चिपकती हैं, बढ़ती हैं और सही तरीके से विकसित होती हैं।

प्रयोगशाला परीक्षणों में इस तकनीक ने काफी अच्छे परिणाम दिए। इससे बने ढांचों में 90 प्रतिशत से अधिक कोशिकाएं जीवित रहीं, जो इसकी सफलता का बड़ा संकेत है। इसके साथ ही इसमें हड्डी निर्माण और कोलेजन बनने की क्षमता भी देखी गई, जो टिश्यू की मरम्मत के लिए बेहद जरूरी है। इस तकनीक की खासियत यह है कि इससे बहुत सटीक आकार वाले टिश्यू तैयार किए जा सकते हैं।

इसका मतलब है कि भविष्य में मरीज के शरीर के अनुसार बिल्कुल फिट बैठने वाले टिश्यू बनाए जा सकेंगे। इससे व्यक्तिगत इलाज को नई दिशा मिल सकती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह बायो-इंक मरीज के अनुसार खास डिजाइन वाले टिश्यू बनाने में मदद करेगा, जिससे इलाज अधिक प्रभावी हो सकता है। फिलहाल, यह तकनीक शुरुआती चरण में है। आगे पशुओं पर परीक्षण किए जाएंगे और उसके बाद इंसानों पर क्लिनिकल परीक्षण की दिशा में काम होगा।