भोपाल : 29 अप्रैल/ रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल के कृषि संकाय द्वारा विश्व दलहन दिवस के अवसर पर एक विशेष शैक्षणिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को दालों के पोषण महत्व, सतत कृषि में उनकी भूमिका तथा भारत में दलहन उत्पादन से जुड़ी चुनौतियों के प्रति जागरूक करना था। इस अवसर पर 100 से अधिक विद्यार्थियों ने सहभागिता कर विशेषज्ञों से महत्वपूर्ण तकनीकी जानकारी प्राप्त की।
कार्यक्रम का संचालन एवं समन्वयन कृषि संकाय के कार्यक्रम समन्वयक डॉ. ऋषिकेश मंडलोई द्वारा किया गया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि दालें भारतीय भोजन का अभिन्न हिस्सा हैं तथा शाकाहारी आहार में प्रोटीन का प्रमुख स्रोत हैं। उन्होंने बताया कि दलहनी फसलें जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। साथ ही, उन्होंने जलवायु परिवर्तन, कीट एवं रोगों तथा बदलते फसल चक्र के कारण दलहन उत्पादन में आ रही चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कृषि संकाय के अधिष्ठाता प्रो. एच. डी. वर्मा ने ग्रामीण क्षेत्रों में कुपोषण की समस्या पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि दालें सस्ती, सुलभ एवं उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन का महत्वपूर्ण स्रोत हैं, जो पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहायक हैं। उन्होंने केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए संचालित विभिन्न योजनाओं एवं कार्यक्रमों की जानकारी भी साझा की।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर के प्रधान वैज्ञानिक (दलहन) डॉ. ए. एन. टिकले रहे। उन्होंने “शाकाहारी आहार में दालें : प्रोटीन का प्रमुख स्रोत” विषय पर विस्तृत व्याख्यान दिया। अपने संबोधन में उन्होंने दालों के वैश्विक एवं राष्ट्रीय परिदृश्य, पोषण मूल्य तथा खाद्य सुरक्षा में उनकी भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने चना, अरहर, मसूर, मूंग, उड़द एवं मटर जैसी प्रमुख दलहनी फसलों के उत्पादन रुझानों, अंतरराष्ट्रीय व्यापार तथा भारत के समक्ष मौजूद चुनौतियों की जानकारी दी।
डॉ. टिकले ने कहा कि भारत विश्व का प्रमुख दलहन उत्पादक एवं उपभोक्ता देश होने के बावजूद उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में अभी कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। उन्होंने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना एवं कृषि यंत्रीकरण उपमिशन जैसी सरकारी योजनाओं की जानकारी देते हुए बताया कि इन योजनाओं के माध्यम से दलहन उत्पादन, सिंचाई सुविधाओं और आधुनिक कृषि तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्धता के लिए बीज प्रमाणीकरण, अनुरेखण एवं समग्र भंडार प्रबंधन, साथी पहल के महत्व को भी रेखांकित किया।
उन्होंने मध्यप्रदेश की जलवायु के अनुरूप उन्नत किस्मों, आधुनिक फसल प्रबंधन तकनीकों, निजी क्षेत्र की भागीदारी, कृषि पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती तथा जलवायु अनुकूल उच्च उत्पादक किस्मों के विकास पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई।
तकनीकी व्याख्यान के पश्चात आयोजित प्रश्न–उत्तर सत्र में विद्यार्थियों ने दलहन उत्पादन, उन्नत किस्मों, जलवायु परिवर्तन, कीट एवं रोग प्रबंधन तथा सरकारी योजनाओं से जुड़े अनेक प्रश्न पूछे, जिनका डॉ. टिकले ने वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण से समाधान प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम के अंत में कृषि संकाय के विभागाध्यक्ष डॉ. अशोक कुमार वर्मा ने मुख्य अतिथि, प्राध्यापकों, विद्यार्थियों एवं आयोजन समिति के सभी सदस्यों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के शैक्षणिक आयोजन विद्यार्थियों को कृषि क्षेत्र की समकालीन चुनौतियों, नवाचारों एवं संभावनाओं से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यह आयोजन विद्यार्थियों के लिए दलहनों के पोषण महत्व, उत्पादन स्थिति तथा भविष्य की रणनीतियों को समझने का एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ, जो सतत कृषि, पोषण सुरक्षा एवं ग्रामीण विकास के प्रति जागरूकता बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगा।

