नई दिल्ली, 28 मई (आईएएनएस)। दिल्ली विधानसभा परिसर में गुरुवार को एक खास कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में केंद्रीय विधानसभा की 1924 से 1930 तक की कार्यवाहियों का विस्तृत संकलन जारी किया गया। इन कार्यवाहियों को 89 खंडों में तैयार किया गया है, जिनमें उस दौर की संसदीय परंपराओं, बहसों और ऐतिहासिक फैसलों का पूरा लेखा-जोखा दर्ज है। इस संकलन का लोकार्पण लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने किया। कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू समेत कई नेता मौजूद रहे।
दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि यह सिर्फ किताबों का विमोचन नहीं है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक विरासत को सहेजने का एक बड़ा प्रयास है। विट्ठलभाई पटेल देश के पहले भारतीय निर्वाचित अध्यक्ष बने थे। उनकी अध्यक्षता में लगभग 400 बैठकों का संचालन हुआ था। उस समय की पूरी कार्यवाही को अब दस्तावेज के रूप में लोगों के सामने लाया गया है ताकि नई पीढ़ी यह जान सके कि भारत में लोकतांत्रिक परंपराएं कितनी पुरानी और मजबूत रही हैं।
विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि दिल्ली विधानसभा आज आधुनिक तकनीक के साथ आगे बढ़ रही है। विधानसभा पूरी तरह पेपरलेस और डिजिटाइज्ड हो चुकी है। यहां सौर ऊर्जा का इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन इसके साथ-साथ इतिहास और विरासत को भी सहेजना उतना ही जरूरी है। इसी सोच के तहत विधानसभा परिसर में एक संग्रहालय स्थापित करने की योजना बनाई गई है, जहां इस भवन और भारतीय लोकतंत्र से जुड़ी ऐतिहासिक चीजों को प्रदर्शित किया जाएगा।
वहीं, भाजपा सांसद मनोज तिवारी ने भी इस पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि जब से विजेंद्र गुप्ता विधानसभा अध्यक्ष बने हैं, तब से उन्होंने इस ऐतिहासिक भवन से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने रखी हैं। उन्होंने बताया कि आज जहां दिल्ली विधानसभा है, कभी यही देश का केंद्रीय सचिवालय हुआ करता था। आज के सांसदों जैसी व्यवस्था उस समय भी यहां मौजूद थी और विट्ठलभाई पटेल जैसे नेता इसकी अध्यक्षता करते थे।
मनोज तिवारी ने कहा कि इन दस्तावेजों से पता चलता है कि अंग्रेजों के शासनकाल में भी भारतीय नेताओं ने जनविरोधी बिलों का मजबूती से विरोध किया। कई बार अंग्रेज सरकार के बिल इसी सदन में गिरा दिए गए थे। उन्होंने कहा कि उस समय पूरी दुनिया में अंग्रेजों का दबदबा था, लेकिन भारत के नेताओं ने इसी भवन में लोकतांत्रिक ताकत का परिचय दिया।
मनोज तिवारी ने कहा कि भारत को संविधान भले 1950 में मिला, लेकिन लोकतांत्रिक सोच और संसदीय परंपराएं उससे बहुत पहले से मौजूद थीं। विट्ठलभाई पटेल जैसे नेताओं ने उस समय लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूती से लागू किया।

