Wednesday, July 8, 2026
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आईआईटी मंडी ने हिमालय क्षेत्र के लिए ‘लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग सिस्टम’ किया विकसित

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नई दिल्ली, 8 जुलाई (आईएएनएस)। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) मंडी के वैज्ञानिकों ने भारतीय हिमालयी क्षेत्र के लिए पूरी तरह से काम करने वाला ‘लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग सिस्टम’ विकसित किया है। इसका मकसद मॉनसून के दौरान एक वेब-बेस्ड प्लेटफॉर्म के जरिए भूस्खलन के जोखिमों की रोजाना भविष्यवाणी करके आपदा की तैयारी को बेहतर बनाना है।

भारतीय हिमालयी क्षेत्र देश के सबसे ज्यादा लैंडस्लाइड वाले इलाकों में से एक है, जहां बदलते क्लाइमेट पैटर्न की वजह से ढलानों के टूटने की दर बढ़ रही है, जिससे जानमाल का भारी नुकसान होता है।

इस रिसर्च को आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायर्नमेंटल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर डेरिक्स प्रेज शुक्ला ने रिसर्च स्कॉलर अंकित सिंह और नितेश धीमान के साथ मिलकर लीड किया।

लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग सिस्टम, इलाके की संवेदनशीलता की जानकारी को रियल-टाइम बारिश के डेटा के साथ मिलाकर लैंडस्लाइड की संभावना का अनुमान लगाता है और उस पर नजर रखता है। यह अधिकारियों और डिजास्टर मैनेजमेंट एजेंसियों को समय पर बचाव के उपाय करने में मदद करने के लिए जगह के हिसाब से चेतावनी जारी करता है।

प्रोफेसर शुक्ला ने कहा कि यह सिस्टम मानसून सीजन की शुरुआत से एक वेब-बेस्ड एप्लिकेशन के जरिए रोजाना लैंडस्लाइड का अनुमान देता है, जिससे ज्यादा जोखिम वाले इलाकों की पहले से पहचान करने में मदद मिलती है और अधिकारियों और समुदायों को समय पर खाली करने और तैयारी के उपाय करने में मदद मिलती है।

उन्होंने कहा कि सैटेलाइट-बेस्ड अर्ली वार्निंग सिस्टम आपदा के जोखिम को कम करने में सबसे असरदार इन्वेस्टमेंट में से एक हैं क्योंकि वे साइंटिफिक डेटा को समय पर, एक्शन लेने लायक जानकारी में बदलते हैं। उनके अनुसार, पूरे इलाके में फोरकास्टिंग प्लेटफॉर्म में तैयारी को मजबूत करने, इमरजेंसी रिस्पॉन्स को बेहतर बनाने और लैंडस्लाइड के ज्यादा खतरे के समय डिजास्टर मैनेजमेंट एजेंसियों के बीच कोऑर्डिनेशन बढ़ाने की क्षमता है।

भारत में कई लैंडस्लाइड चेतावनी सिस्टम हैं, लेकिन वे सिर्फ छोटे-छोटे इलाकों तक ही काम करते हैं। इसके उलट, आईआईटी मंडी द्वारा विकसित किया गया ‘लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग सिस्टम’ पूरे भारतीय हिमालयी क्षेत्र को कवर करता है। इससे यह देश का सबसे बड़े स्तर पर काम करने वाला लैंडस्लाइड पूर्वानुमान सिस्टम बन गया है।

रिसर्चर्स ने इस सिस्टम को मल्टी-स्टेज मेथडोलॉजी का इस्तेमाल करके डेवलप किया।

उन्होंने सबसे पहले जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया डेटाबेस से लगभग 26,000 पुराने लैंडस्लाइड की पहचान की ताकि लैंडस्लाइड ससेप्टिबिलिटी मैप तैयार किया जा सके। फिर कई लैंडस्लाइड-ट्रिगरिंग फैक्टर्स को एन्सेम्बल मशीन लर्निंग मॉडल्स का इस्तेमाल करके इंटीग्रेट किया गया।

टीम ने नासा के ग्लोबल लैंडस्लाइड कैटलॉग के डेटा और आईएमईआरजी सैटेलाइट डेटासेट से मिले सात रेनफॉल पैरामीटर्स का इस्तेमाल करके प्रोबेबिलिटी ऑफ रेनफॉल-इंड्यूस्ड लैंडस्लाइड्स मॉडल भी डेवलप किया।