Wednesday, July 22, 2026
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हिन्दी पत्रकारिता का भविष्य संवेदनशीलता, विश्वसनीयता और साहित्यिक सरोकारों से तय होगा: आरएनटीयू की राष्ट्रीय संगोष्ठी

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भोपाल : 10 जुलाई/ रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय (आरएनटीयू) में हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन पत्रकारिता के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर गहन मंथन हुआ। “समकालीन हिन्दी पत्रकारिता : परंपरा, परिवर्तन और भविष्य” विषय पर आयोजित उद्घाटन सत्र सहित दिनभर चार महत्वपूर्ण सत्रों में देश के वरिष्ठ पत्रकारों, साहित्यकारों और शिक्षाविदों ने पत्रकारिता में साहित्य, संस्कृति, विज्ञान, तकनीकी बदलाव और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के प्रभाव पर विस्तार से अपने विचार रखे।

कार्यक्रम का शुभारंभ प्रसिद्ध सितार वादक अनिरुद्ध जोशी के मनमोहक सितार वादन से हुआ। उद्घाटन सत्र में वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर, ओम थानवी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी तथा आरएनटीयू के कुलाधिपति एवं वरिष्ठ साहित्यकार संतोष चौबे ने हिन्दी पत्रकारिता की 200 वर्षों की गौरवशाली यात्रा पर अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम का संचालन टैगोर विश्व कला एवं संस्कृति केंद्र के निदेशक विनय उपाध्याय ने किया, जबकि कुलसचिव डॉ. संगीता जौहरी ने आभार व्यक्त किया।

पत्रकारिता को बचानी होगी अपनी विश्वसनीयता

उद्घाटन सत्र में विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में समाचार पत्रों ने राष्ट्रनिर्माण की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आज फेक न्यूज, मोबाइल आधारित पत्रकारिता और डिजिटल माध्यमों की चुनौतियों के बीच पत्रकारिता में जिम्मेदारी और संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने मुख्यधारा से दूर छूट रहे “असल भारत” की आवाज़ को सामने लाने पर भी जोर दिया।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने कहा कि पत्रकारिता का दायित्व केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज में विवेक और समझ विकसित करना भी है। उन्होंने मीडिया की बदलती प्राथमिकताओं और प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता को लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण बताया।

वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि स्वतंत्रता पूर्व की पत्रकारिता राष्ट्रहित और सामाजिक दायित्व से प्रेरित थी, जबकि आज बाजारवाद नई चुनौतियां खड़ी कर रहा है। इसके बावजूद जनता का सबसे अधिक भरोसा आज भी प्रिंट मीडिया पर कायम है।

संगोष्ठी के संयोजक एवं वरिष्ठ साहित्यकार संतोष चौबे ने कहा कि साहित्य, कला और संस्कृति मनुष्य को मानवीय मूल्यों से जोड़ते हैं। उन्होंने विज्ञान पत्रकारिता के घटते दायरे, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के प्रभाव और बदलते वैश्विक परिदृश्य पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सृजनात्मकता और मानवीय संवेदनाओं को बचाए रखना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

इस अवसर पर ‘विश्वमय हिन्दी पत्रकारिता’ सहित दो पुस्तकों तथा राष्ट्रीय संगोष्ठी की स्मारिका का भी विमोचन किया गया।

मुख्यधारा की पत्रकारिता में साहित्य के स्थान पर गंभीर चर्चा

दूसरे सत्र “मुख्यधारा की हिन्दी पत्रकारिता में साहित्य का स्थान” की अध्यक्षता डॉ. सुधीश पचौरी ने की। उन्होंने कहा कि साहित्य और पत्रकारिता के उद्देश्य अलग-अलग होते हुए भी दोनों समाज को दिशा देने का कार्य करते हैं।

संदीप अवस्थी ने कहा कि साहित्य मनुष्य की संवेदनाओं को समृद्ध करता है, जबकि मनोज श्रीवास्तव ने चिंता जताई कि आज एल्गोरिद्म यह तय कर रहे हैं कि समाज क्या पढ़े और क्या देखे। वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन ने कहा कि मुख्यधारा के मीडिया में साहित्य का स्थान लगातार सीमित होता जा रहा है, जिससे साहित्य और पत्रकारिता के बीच दूरी बढ़ी है।

बलराम गुमास्ता ने कहा कि सामाजिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं की रक्षा साहित्य और पत्रकारिता दोनों की साझा जिम्मेदारी है।

साहित्यिक और विज्ञान पत्रकारिता पर भी हुआ मंथन

तीसरे सत्र “समकालीन हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता का परिदृश्य और वनमाली कथा” की अध्यक्षता संतोष चौबे ने की। इस दौरान पंकज सुबीर, क्षमा शर्मा, अखिलेश, मुकेश वर्मा और गीताश्री सहित कई वक्ताओं ने साहित्यिक पत्रकारिता के बदलते स्वरूप और समकालीन चुनौतियों पर अपने विचार रखे।

वहीं चौथे सत्र “वर्तमान परिवेश में विज्ञान पत्रकारिता : विशेष संदर्भ ‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए'” में विज्ञान पत्रकारिता की बदलती भूमिका पर चर्चा हुई। सत्र की अध्यक्षता मनोज कुमार पटेरिया ने की। इसमें देवेंद्र मेवाड़ी, कृष्ण कुमार मिश्र, मनीष मोहन गोरे और समीर गांगुली ने विज्ञान संचार की चुनौतियों और संभावनाओं पर विचार रखे। संवाद में कुमार सुरेश, वीणा सिन्हा और राग तेलंग शामिल हुए, जबकि संचालन मोहन सगोरिया ने किया।

शोधार्थियों ने प्रस्तुत किए शोधपत्र

राष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतर्गत आयोजित विशेष शोध सत्र में विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों ने समकालीन पत्रकारिता और जनसंचार से जुड़े विषयों पर अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार अजय बोकिल ने की। विशेषज्ञ डॉ. सावित्री सिंह परिहार और डॉ. स्मिता तिवारी ने शोधपत्रों पर अपने सुझाव दिए। सत्र का संयोजन डॉ. विशाखा राजूरकर राज एवं डॉ. योगेश पटेल ने किया।

दिनभर चले विभिन्न सत्रों में पत्रकारिता के दो सौ वर्षों की यात्रा, साहित्य, संस्कृति, विज्ञान पत्रकारिता, तकनीकी बदलाव, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मीडिया के भविष्य पर गंभीर विमर्श हुआ। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. आर.पी. दुबे, देशभर से आए वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार, शिक्षाविद, शोधार्थी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।