पटना, 24 जुलाई (आईएएनएस)। बिहार की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव में चुनावी मुकाबला अब दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है। 30 जुलाई को होने वाले मतदान से पहले सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने प्रचार अभियान तेज कर दिया है।
इस बीच चुनावी बहस अब विकास और वादों से आगे बढ़कर ‘बाहरी बनाम बांकीपुर का बेटा’ के मुद्दे पर केंद्रित होती दिखाई दे रही है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा सदस्य बनने के बाद खाली हुई इस सीट पर भाजपा ने स्थानीय नेता नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया है, जबकि जन सुराज ने पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर को मैदान में उतारा है।
भाजपा इस चुनाव में नीरज कुमार सिन्हा को “बांकीपुर का बेटा” बताकर स्थानीय पहचान को प्रमुख मुद्दा बना रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बांकीपुर विधानसभा सीट लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ रही है। ऐसे में इस सीट को बरकरार रखना भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न है।
वहीं, जन सुराज के लिए यह चुनाव राजनीतिक विस्तार और पार्टी प्रमुख प्रशांत किशोर की स्वीकार्यता की बड़ी परीक्षा माना जा रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान क्षेत्र में स्थानीय बनाम बाहरी उम्मीदवार को लेकर चर्चा भी तेज हो गई है। कई स्थानीय मतदाताओं का कहना है कि विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व ऐसे व्यक्ति को करना चाहिए, जो वर्षों से क्षेत्र के लोगों के बीच रहा हो और स्थानीय समस्याओं से भलीभांति परिचित हो। उनका मानना है कि जनप्रतिनिधि ऐसा होना चाहिए, जिससे आम लोग आसानी से संपर्क कर सकें। इसी मुद्दे को आगे बढ़ाते हुए भाजपा नेता ऋतुराज सिन्हा ने जन सुराज प्रमुख प्रशांत किशोर पर निशाना साधा।
उन्होंने कहा, “प्रशांत किशोर चुनाव जीत भी गए तो बांकीपुर की जनता उन्हें कहां खोजने जाएगी? यहां के लोगों को घर का बेटा जनप्रतिनिधि चाहिए। बांकीपुर को सलाहकार नहीं, बल्कि ऐसा सेवादार चाहिए जो हर समय जनता के बीच उपलब्ध रहे।” भाजपा नेताओं का दावा है कि नीरज कुमार सिन्हा लंबे समय से क्षेत्र में सक्रिय हैं और स्थानीय लोगों के सुख-दुख में हमेशा शामिल रहे हैं।
पार्टी का कहना है कि यही वजह है कि चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें व्यापक जनसमर्थन मिल रहा है। दूसरी ओर, जन सुराज इस चुनाव को बिहार की राजनीति में बदलाव की शुरुआत के रूप में पेश कर रही है। पार्टी का कहना है कि मतदाता पारंपरिक राजनीति से अलग विकल्प चाहते हैं और बांकीपुर उपचुनाव उसका संकेत देगा।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बांकीपुर का यह उपचुनाव केवल एक विधानसभा सीट तक सीमित नहीं है। इसके नतीजे भाजपा की परंपरागत पकड़, विपक्षी दलों की रणनीति और जन सुराज की राजनीतिक स्वीकार्यता पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं। ऐसे में मतदान से पहले ‘स्थानीय बनाम बाहरी’ का मुद्दा चुनावी बहस के केंद्र में बना हुआ है।

