नई दिल्ली, 3 अगस्त (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को तमिलनाडु सरकार की याचिका पर नोटिस जारी किया। दरअसल, राज्य सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें मदुरै जिले के तिरुपरंकुंड्रम पहाड़ी पर एक दरगाह के पास स्थित ‘दीपा थून’ यानी दीप स्तंभ पर पारंपरिक कार्तिगई दीपम जलाने की अनुमति दी गई थी।
जस्टिस अरविंद कुमार और विपुल एम पंचोली की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता और प्रतिवादियों से जवाब मांगा। अब आगे की सुनवाई के लिए इस मामले को दूसरे लंबित मामलों से जोड़ दिया गया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के एकतरफा रोक के आग्रह को खारिज कर दिया।
जस्टिस कुमार की अगुवाई वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में विलंब से पहुंचने के पीछे की वजह पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर क्यों तमिलनाडु सरकार ने जून में ही याचिका दाखिल की जबकि हाईकोर्ट ने आदेश जनवरी में दिया था।
राज्य सरकार की ओर से 11 जून को विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दाखिल की गई थी। कुछ दिनों बाद ही मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने अपना पद ग्रहण कर लिया।
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) को लंबित याचिका के साथ जोड़ दिया जाए, जिसे हिंदू धर्म परिषद की ओर से दाखिल किया गया है। इस याचिका में भारतीय पुरातात्विक सर्वे विभाग से थिरुपरनकुंड्रम पहाड़ी की जिम्मेदारी लेने को कहा गया है। साथ ही, विवादित स्थल पर प्रतिदिन दीपक जलाने का आदेश भी दिया गया है।
यह पूरा विवाद पत्थर की मीनार पर स्थित पारंपरिक कार्तिगई दीपम पर दीया जलाने से जुड़ा हुआ है। इसे ‘दीपा थून’ के नाम से भी जाना जाता है। यह दीपा थून थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी के दरगाह पर स्थित है। यहां पर अरुलमिगु सुब्रमण्य स्वामी मंदिर और दरगाह भी है।
इससे पहले, मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने एक पुराने आदेश को बरकरार रखा था, जिसमें जस्टिस जीआर स्वामीनाथन की एकल पीठ शामिल थी। इस आदेश में मंदिर प्रशासन को शीर्ष पर पत्थर के स्तंभ पर कार्तिगई दीपम को जलाने की अनुमति दी गई थी।
साथ ही, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस तर्क को भी खारिज कर दिया, जिसमें यह कहा गया था कि दरगाह के पास किसी भी प्रकार का समारोह सांप्रदायिक तनाव और कानून व्यवस्था को बिगाड़ सकता है।
एकल पीठ ने अपने फैसले में अधिकारियों की आशंकाओं को महज एक ‘काल्पनिक भूत’ करार दिया। साथ ही, सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार के पास प्रशासनिक शक्तियां क्यों है? क्या पुलिस-प्रशासन मंदिर में होने वाले धार्मिक आयोजनों के दौरान शांति-व्यवस्था को बनाए रखने की दिशा में असमर्थ साबित होंगे।
वहीं, हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि मंदिर-प्रशासन के चुनिंदा प्रतिनिधियों के साथ प्रतिवर्ष हर दिन निर्धारित पत्थर के खंभे पर दीपक जलाने से कानून-व्यवस्था खराब नहीं होगी।
राज्य सरकार को आगाह किया गया है कि वो इस प्रकार की आपत्ति के माध्यम से अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश नहीं करें। साथ ही, इस बात पर जोर देते हुए कहा कि यह राज्य सरकार का संवैधानिक कर्तव्य है कि वो शांतिपूर्वक पूजा-पाठ का आयोजन कराए।

