गोवा, 5 अगस्त (आईएएनएस)। गोवा कांग्रेस में अंदरूनी कलह एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। कांग्रेस ने अपनी सोशल मीडिया इंचार्ज शर्मिला सिद्दीकी को पार्टी से सस्पेंड कर दिया है। सिद्दीकी ने पार्टी के नए प्रदेश अध्यक्ष गिरीश चोडनकर द्वारा कथित तौर पर आरएसएस पृष्ठभूमि वाले नेता महेश म्हाम्ब्रे को पार्टी का प्रवक्ता बनाए जाने पर सार्वजनिक रूप से आपत्ति जताई थी। इसके बाद पार्टी ने उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की।
शर्मिला सिद्दीकी ने पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्होंने वर्ष 2021 में कांग्रेस इसलिए जॉइन नहीं की थी कि उन्हें कोई पद मिले। उनका कहना था कि उनके परिवार का राजनीति से कोई संबंध नहीं रहा और न ही उनकी राजनीति में आने की कोई व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा थी। उन्होंने सोशल मीडिया की जिम्मेदारी बिना किसी आर्थिक लाभ के संभाली और अपने खर्च पर पार्टी के लिए काम किया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस में लगातार केवल नए नेताओं के शामिल होने के कार्यक्रम किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने पर ध्यान नहीं दिया जाता। यह केवल फोटो-ऑप्स तक सीमित गतिविधियां हैं।
उन्होंने कहा कि गोवा में कांग्रेस को अपनी संगठनात्मक ताकत बढ़ानी चाहिए थी, न कि केवल गठबंधन की राजनीति पर निर्भर रहना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि कई क्षेत्रों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने अपने दम पर पार्टी को मजबूत किया और स्थानीय चुनावों में सफलता भी दिलाई। शर्मिला सिद्दीकी ने गोवा रिवोल्यूशनरी पार्टी (आरजीपी) के साथ संभावित गठबंधन पर भी कड़ा विरोध जताया। उनका कहना था कि पार्टी कार्यकर्ता इस गठबंधन के खिलाफ थे क्योंकि आरजीपी की विचारधारा स्पष्ट नहीं है।
उन्होंने आरोप लगाया कि आरजीपी के नेता केंद्र में प्रधानमंत्री और भाजपा का समर्थन करते हैं, जबकि गोवा में कांग्रेस के साथ खड़े होने की बात करते हैं। ऐसी दोहरी राजनीतिक सोच कांग्रेस की विचारधारा से मेल नहीं खाती।
शर्मिला ने दावा किया कि पहले उन्हें बिना किसी लिखित नोटिस के सस्पेंड कर दिया गया। काफी समय बाद उन्हें अनुशासनात्मक समिति के सामने पेश होने का पत्र मिला, लेकिन उसमें भी यह नहीं बताया गया कि उन्होंने आखिर कौन-सी अनुशासनहीनता की है।
उन्होंने बताया कि बाद में उन्हें समिति के सामने पेश होना पड़ा, जहां लगभग दो घंटे तक पूछताछ हुई। समिति ने उनसे पूछा कि उन्होंने अपनी शिकायत मीडिया में क्यों रखी। इस पर उन्होंने जवाब दिया कि पार्टी के भीतर ऐसा कोई प्रभावी मंच नहीं बचा था, जहां उनकी बात सुनी जाती।
सिद्दीकी ने कहा कि उन्होंने जो भी बयान दिए, वे कांग्रेस के हित में दिए। उनका कहना था कि गिरीश चोडनकर को दोबारा प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने का फैसला कार्यकर्ताओं की भावनाओं के खिलाफ था। उन्होंने 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले माइकल लोबो को पार्टी में शामिल किए जाने का भी जिक्र किया और कहा कि उस समय भी कार्यकर्ताओं की आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया था, जिसके परिणाम बाद में सामने आए।
शर्मिला सिद्दीकी ने कहा कि उनके सोशल मीडिया रिकॉर्ड को देखकर कोई भी समझ सकता है कि उन्होंने हमेशा भाजपा और आरएसएस की विचारधारा का विरोध किया है। पार्टी में आरएसएस पृष्ठभूमि वाले नेताओं को जिम्मेदारी दिए जाने पर सवाल उठाना कांग्रेस विरोध नहीं, बल्कि कांग्रेस की मूल विचारधारा की रक्षा करना है। अगर मैं गिरीश चोडनकर के फैसले का विरोध करती हूं तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं कांग्रेस के खिलाफ हूं। किसी व्यक्ति का विरोध करना और पार्टी का विरोध करना दोनों अलग बातें हैं।
शर्मिला ने यह भी आरोप लगाया कि जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता केसी वेणुगोपाल गोवा आए थे, तब वह एक प्रतिनिधिमंडल के साथ अपनी बात रखने पहुंची थीं, लेकिन उनकी पूरी बात सुने बिना उन्हें गेट आउट कह दिया गया। उन्होंने कहा कि मैंने यह पूरा घटनाक्रम अनुशासनात्मक समिति के सामने भी रखा और इस बात पर जोर दिया कि समिति की रिपोर्ट में गेट आउट शब्द को दर्ज किया जाए। शुरुआत में समिति इसे रिकॉर्ड में शामिल करने के लिए तैयार नहीं थी, लेकिन उनके आग्रह के बाद इसे रिपोर्ट में दर्ज किया गया।
सिद्दीकी ने कहा कि अनुशासनात्मक समिति के समक्ष उन्होंने विस्तार से अपना पक्ष रखा और यह स्पष्ट किया कि उन्होंने पार्टी के खिलाफ नहीं बल्कि संगठन को मजबूत करने और वैचारिक स्पष्टता बनाए रखने के उद्देश्य से सवाल उठाए थे। उनका आरोप है कि उनकी बात सुनने के बजाय उनके खिलाफ कार्रवाई की गई।

