Thursday, August 13, 2026
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जम्‍मू-कश्‍मीर हाईकोर्ट ने शोपियां के कलेक्टर के खिलाफ न्यायिक मजिस्ट्रेट के ‘कारण बताओ नोटिस’ को रद्द किया

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श्रीनगर, 13 अगस्त (आईएएनएस)। जम्‍मू-कश्‍मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने शोपियां के कलेक्टर के खिलाफ न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जारी ‘कारण बताओ नोटिस’ को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक अधिकारी ने अपने अधिकारों का उल्लंघन किया था।

न्यायमूर्ति राहुल भारती ने 7 अगस्त को यह आदेश सुनाया। वे शोपियां के कलेक्टर के पद पर तैनात आईएएस अधिकारी शिशिर गुप्ता द्वारा उफाइरा गुलजार और अन्य के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रहे थे।

शोपियां के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने कलेक्टर को यह नोटिस जारी किया था क्योंकि भरण-पोषण (मेंटेनेंस) की वसूली से जुड़े निर्देशों का पालन नहीं किया गया था। यह मामला प्रतिवादी की पत्नी और बेटी द्वारा ‘दंड प्रक्रिया संहिता, 1973’ की धारा 125 के तहत शुरू की गई भरण-पोषण की कार्यवाही से जुड़ा था।

यह कार्यवाही 20 अप्रैल 2023 को शुरू हुई थी और न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 4 दिसंबर 2025 को इसका निपटारा करते हुए 18,000 रुपये का मासिक भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। इसमें पत्नी के लिए 10,000 रुपये और बेटी के लिए 8,000 रुपये शामिल थे। आदेश दिया गया था कि भरण-पोषण की रकम कार्यवाही शुरू होने की तारीख से लागू होगी। जब प्रतिवादी नियमित भरण-पोषण और बकाया राशि का भुगतान करने में विफल रहा, तो पत्नी और बेटी ने 9 दिसंबर 2025 को एक ‘एक्जीक्यूशन एप्लीकेशन’ (आदेश के पालन के लिए अर्जी) दायर की।

हाईकोर्ट ने पाया कि आदेश के पालन की कार्यवाही रुकी हुई थी क्योंकि प्रतिवादी को भेजे गए नोटिस बार-बार तामील नहीं हो पा रहे थे यानी उस तक नहीं पहुंच पा रहे थे।

कोर्ट ने देखा कि न्यायिक मजिस्ट्रेट ने प्रतिवादी की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए उपलब्ध कानूनी तरीकों जैसे जमानती या गैर-जमानती वारंट जारी करने का इस्तेमाल नहीं किया। इसके बजाय 20 फरवरी 2026 को मजिस्ट्रेट ने भरण-पोषण की राशि की वसूली के लिए शोपियां के डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर को ‘लेवी वारंट’ जारी कर दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी के संबंधित प्रावधानों के तहत भरण-पोषण के तौर पर तय की गई राशि को जुर्माने की तरह वसूलने के लिए वारंट जारी किया जा सकता है। एक बार ऐसा वारंट जारी होने के बाद वसूली की कार्यवाही कलेक्टर के पास चली जाती है, जो डिफॉल्टर (भुगतान न करने वाले व्यक्ति) की चल या अचल संपत्ति के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। मामले ने तब एक नया मोड़ लिया जब जुडिशियल मजिस्ट्रेट ने डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर को निर्देश दिया कि वे मेंटेनेंस (भरण-पोषण) का भुगतान न करने वाले व्यक्ति के नाम पर मौजूद चल और अचल संपत्तियों का विवरण दें।

हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, असिस्टेंट कमिश्नर रेवेन्यू शोपियां ने 4 जून को एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपी, जिसमें प्रतिवादी नंबर 3 की अचल संपत्ति की पहचान की गई थी। हालांकि, मजिस्ट्रेट को इस रिपोर्ट पर आपत्ति थी क्योंकि इसमें केवल अचल संपत्ति की पहचान की गई थी और चल संपत्तियों की पहचान नहीं की गई थी।

इसके परिणामस्वरूप, कलेक्टर को 10 जुलाई को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिसके बाद कलेक्टर ने हाईकोर्ट का रुख किया। हाई कोर्ट ने इस कार्रवाई को गलत माना। जस्टिस भारती ने कहा कि 20 फरवरी को कलेक्टर को लेवी वारंट जारी करने के बाद मजिस्ट्रेट ने बाद में 4 जुलाई को एक और लेवी वारंट जारी किया था, जिसे एसएचओ, पुलिस स्टेशन शोपियां के माध्यम से डिफॉल्टर को तामील (सर्व) कराया जाना था।

हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित प्रावधानों के तहत ऐसे दूसरे लेवी वारंट की कोई गुंजाइश नहीं थी और कहा कि मजिस्ट्रेट ने असल में कलेक्टर को पहले जारी किए गए लेवी वारंट को निष्प्रभावी कर दिया था।

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि न्‍यायिक मजिस्ट्रेट ने सीआरपीसी के तहत प्राप्त अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया था और इसलिए 10 जुलाई के कारण बताओ नोटिस को गैरकानूनी घोषित कर उसे रद्द कर दिया। हालांकि, रिकवरी की कार्यवाही को समाप्त करने के बजाय हाईकोर्ट ने जुडिशियल मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वे डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर, शोपियां के नाम एक नया लेवी वारंट जारी करें।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि वारंट का निष्पादन जम्मू-कश्मीर लैंड रेवेन्यू एक्ट की धारा 91 के तहत भूमि राजस्व की बकाया राशि की वसूली के लिए निर्धारित तरीके से किया जाए।

इसने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि वे मेंटेनेंस न देने वाले व्यक्ति की पहचानी गई संपत्ति को कुर्क करने और बेचने की प्रक्रिया शुरू करें ताकि वसूली गई राशि को पत्नी और बेटी को भुगतान के लिए जुडिशियल मजिस्ट्रेट के पास जमा किया जा सके।

यह आदेश प्रभावी रूप से रिकवरी प्रक्रिया को कानूनी रास्ते पर वापस लाता है। साथ ही, यह सुनिश्चित करता है कि दो लाभार्थियों को मिलने वाला मेंटेनेंस कानूनी रूप से निर्धारित रिकवरी तंत्र के माध्यम से प्राप्त किया जाए।