नई दिल्ली, 14 अगस्त (आईएएनएस)। रक्षा क्षेत्र में पिछले एक दशक में किए गए व्यापक सुधारों के चलते भारत सैन्य उपकरणों के उत्पादन और निर्यात के मामले में मजबूत, आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर विश्वसनीय शक्ति के रूप में उभरा है। स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर सरकार की ओर से जारी फैक्टशीट के अनुसार, देश का रक्षा उत्पादन 2025-26 में रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जो 2013-14 में महज 4,746 करोड़ रुपये था।
2025-26 में रक्षा उत्पादन में सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों की हिस्सेदारी 76 प्रतिशत रही, जबकि निजी क्षेत्र ने 24 प्रतिशत योगदान दिया।
भारत के रक्षा निर्यात में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। रक्षा निर्यात 2013-14 में 686 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 38,424 करोड़ रुपये हो गया। भारतीय सैन्य उपकरणों को अब 80 से अधिक देशों में बाजार मिल रहा है।
2025-26 में कुल रक्षा निर्यात में निजी क्षेत्र का योगदान 17,353 करोड़ रुपये यानी 45.16 प्रतिशत रहा, जबकि रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों ने 21,071 करोड़ रुपये यानी 54.84 प्रतिशत का योगदान दिया।
केंद्र सरकार ने 2029 तक सालाना 3 लाख करोड़ रुपये का रक्षा उत्पादन और 50,000 करोड़ रुपये का रक्षा निर्यात हासिल करने का लक्ष्य तय किया है।
रक्षा क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास के लिए आवंटन भी बढ़ाया गया है। यह राशि 2014-15 में 13,716.14 करोड़ रुपये से बढ़कर 2026-27 में 29,100.25 करोड़ रुपये हो गई है, जो 112 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि है।
वर्ष 2022-23 से रक्षा रक्षा क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास बजट का 25 प्रतिशत हिस्सा उद्योग, स्टार्टअप और अकादमिक संस्थानों के लिए खोला गया है, ताकि नवाचार को बढ़ावा देने के साथ रक्षा उत्पादन को आधुनिक बनाया जा सके।
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की 24 प्रयोगशालाओं में उपलब्ध परीक्षण सुविधाओं को डिफेंस टेस्टिंग पोर्टल (डीटीपी) के जरिए उद्योग के लिए सुलभ बनाया गया है। रक्षा मंत्रालय द्वारा संचालित इस डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से घरेलू निर्माता, स्टार्टअप और उद्योग सरकारी परीक्षण सुविधाओं का सशुल्क उपयोग करने के लिए आवेदन कर सकते हैं।
भारत की सर्वोच्च रक्षा खरीद संस्था रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) भी स्वदेशी खरीद के जरिए ‘आत्मनिर्भर भारत’ को बढ़ावा दे रही है। परिषद ने 6 लाख करोड़ रुपये से अधिक की डीआरडीओ द्वारा डिजाइन और भारतीय उद्योग द्वारा निर्मित रक्षा प्रणालियों के लिए एओएन को मंजूरी दी है।
स्वदेशी रक्षा खरीद के तहत 97 तेजस एमके-1ए लड़ाकू विमानों की करीब 62,000 करोड़ रुपये की खरीद और 156 एलसीएच ‘प्रचंड’ हेलीकॉप्टरों की करीब 62,700 करोड़ रुपये की खरीद को मंजूरी दी गई है। इन परियोजनाओं से देश की घरेलू एयरोस्पेस और रक्षा विनिर्माण क्षमता को मजबूती मिल रही है।
रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (डीएपी) 2020 ने स्वदेशी खरीद और घरेलू विनिर्माण को मजबूत किया। इसके साथ ही भारतीय कंपनियों के लिए रक्षा क्षेत्र में डिजाइन, विकास और उत्पादन के अवसर बढ़ाए गए।
इससे पहले रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) 2016 के जरिए रक्षा खरीद व्यवस्था को सरल बनाया गया और ‘मेक इन इंडिया’ को आगे बढ़ाया गया। इसने रक्षा खरीद से जुड़े बाद के सुधारों की नींव तैयार की।
सरकार के अनुसार, रक्षा खरीद मैनुअल (डीपीएम) 2025 ने करीब 1 लाख करोड़ रुपये की राजस्व खरीद प्रक्रिया को सुव्यवस्थित किया। इसके तहत मंजूरियों को तेज किया गया, स्वदेशी परियोजनाओं के लिए दंड प्रावधानों में राहत दी गई और दीर्घकालिक ऑर्डर का आश्वासन दिया गया।

