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विपक्ष के साथ ही सत्ता पक्ष का भी मिला समर्थन, जब तीन प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में लोकसभा अध्यक्ष रहे पीए संगमा

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नई दिल्ली, 31 अगस्त (आईएएनएस)। पूर्वोत्तर से केंद्र की राजनीति तक, एक ऐसे स्वनिर्मित राजनेता, जिन्होंने राजनीतिक-सामाजिक जीवन में अमिट छाप छोड़ी। बतौर लोकसभा अध्यक्ष तीन प्रधानमंत्रियों को देखा लेकिन राजनीतिक शुचिता पर आंच नहीं आने दी। बात हो रही है पूर्व लोकसभा अध्यक्ष और मेघालय के मुख्यमंत्री रहे पूर्णो अगितोक संगमा यानी पीए संगमा की।

संसदीय इतिहास में इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि सत्ताधारी दल विपक्ष के उम्मीदवार को समर्थन दे लेकिन सारी परंपराएं धरी रह गईं। एक ऐसा दौर था, जब भारतीय राजनीति उथल-पुथल दौर से गुजर रही थी। गठबंधन का एक नया युग शुरू रहा था। पहली बार सबसे बड़े राजनीतिक दल के नेता के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। विश्वास मत से पहले लोकसभा के अध्यक्ष का चुनाव होना था। विपक्ष ने पीए संगमा के रूप में अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया।

राजनीति के इतिहास में यह नया अवसर आया, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने पीए संगमा को ही अपना समर्थन दे दिया। विपक्ष के उम्मीदवार संगमा सत्ता पक्ष के समर्थन से लोकसभा के अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान हुए।

हालांकि, मई 1996 से मार्च 1998 तक के अपने कार्यकाल में उन्होंने तीन प्रधानमंत्री (अटल बिहारी वाजपेयी, एचडी देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल) देखे। अलग-अलग विचार वाले शीर्ष नेतृत्व के साथ काम किया लेकिन पद की गरिमा कभी कम नहीं होने दी।

एक साधारण सी पृष्ठभूमि से आने वाले पीए संगमा का जन्म 1 सितंबर 1947 को मेघालय के पश्चिमी गारो हिल्स जिले के चपाहाटी गांव में हुआ था। बचपन कई मुश्किलों के बीच गुजरा। फिर भी दृढ़ निश्चयी संगमा ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्नातकोत्तर के साथ-साथ कानून की भी डिग्री प्राप्त की। एक शिक्षक के तौर पर अपना करियर शुरू करने वाले संगमा जल्द ही राजनीति में आ गए और पहली बार 1977 में मेघालय की तुरा लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

पीए संगमा एक ऐसे कुशल प्रशासक थे, जिनका राष्ट्रीय और अहम मुद्दों पर सुझाव हमेशा महत्वपूर्ण होता था। संगमा के पास कानूनी प्रशिक्षण, सांसद और मंत्री के रूप में लंबा अनुभव होने के साथ-साथ निष्पक्षता, पारदर्शिता, शालीनता, बुद्धिमता व हाजिर जवाबी जैसे वे सभी गुण मौजूद थे जो इस गरिमामयी पद के लिए आवश्यक होते हैं।

उनकी राजनीतिक समझ की बानगी पद पर नहीं रहते हुए भी दिखी, जब 2014 के लोकसभा चुनाव के परिणाम से पहले 12 मई को गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से उन्होंने मुलाकात की थी। मीडिया में आई रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने उस मुलाकात के बाद कहा था कि ‘भावी प्रधानमंत्री’ से मिलने आया था।

साल 2012 में उन्होंने राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़ा, जिसमें विपक्ष के कई दलों ने उन्हें अपना समर्थन दिया। 4 मार्च 2016 को दिल का दौरा पड़ने के कारण उनका निधन हो गया। साल 2017 में पीए संगमा को मरणोपरांत पद्म विभूषण सम्मान से सम्मानित किया गया।