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एक दशक बाद केरल में लौटा पावर कट का मुद्दा, सतीशन सरकार के खिलाफ विपक्ष को मिला बड़ा हथियार

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तिरुवनंतपुरम, 12 सितंबर (आईएएनएस)। केरल की राजनीति में करीब एक दशक तक बिजली कटौती का मुद्दा लगभग गायब रहा, लेकिन पिछले एक सप्ताह से रात के समय हो रही लंबी बिजली कटौती ने राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं। विपक्ष ने मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को घेरना शुरू कर दिया है, जिससे पहली बार सरकार इस मुद्दे पर गंभीर राजनीतिक दबाव महसूस कर यही है।

मई में राज्य की सत्ता संभालने वाली कांग्रेस अब तक अपनी छवि को नुकसान पहुंचाने वाले किसी बड़े विवाद से बची हुई थी, लेकिन बिजली संकट अब एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है, जिससे सरकार और बिजली मंत्री सनी जोसेफ दोनों ही जनता की कड़ी आलोचना का सामना कर रहे हैं।

टीवी चैनलों पर उपभोक्ताओं की शिकायतों की बाढ़ आ गई है। कई लोगों का कहना है कि उन्होंने पिछले दस साल में इतनी बार बिजली जाते हुए नहीं देखी। जनता की इस नाराजगी ने लेफ्ट के सोशल मीडिया नेटवर्क को नया जोश दे दिया है। लेफ्ट समर्थक मीम्स, पोस्ट और पिछली एलडीएफ सरकार के साथ तुलना के जरिए बिजली कटौती को खूब उछाल रहे हैं।

यह दिलचस्प है कि नई सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही लेफ्ट समर्थक सोशल मीडिया हैंडल सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उन्हें कोई ऐसा मुद्दा नहीं मिल रहा था जो जनता से जुड़ सके। अब बिजली कटौती ने उन्हें ठीक वही मौका दे दिया है जिसकी उन्हें तलाश थी।

सतीशन सरकार और मंत्री सनी जोसेफ ने इस संकट के लिए पिछली एलडीएफ सरकार के फैसलों को जिम्मेदार ठहराया है, खासकर ओमन चांडी सरकार के समय शुरू हुए एक बिजली खरीद समझौते को रद्द करने के फैसले को। हालांकि आलोचकों का कहना है कि जब पिनाराई विजयन सरकार ने अप्रैल में पद छोड़ा था, तब केरल में ऐसी कटौती नहीं हो रही थी, इसलिए संकट के समय पर सवाल उठ रहे हैं।

लंबे समय के समाधान की बात करते हुए सनी जोसेफ ने शनिवार को कहा कि सरकार उन घरों के लिए एक आकर्षक टैरिफ सिस्टम पर विचार कर रही है जो अपनी स्टोर की हुई बिजली केरल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (केएसईबी) को वापस देंगे। सरकार सोलर पावर से जुड़े कम्युनिटी बैटरी सिस्टम और अपने घर में बैटरी स्टोरेज लगाने वाले परिवारों के लिए सब्सिडी पर भी विचार कर रही है।

मंत्री के मुताबिक, इलेक्ट्रिक गाड़ियों के बढ़ते इस्तेमाल से बिजली की मांग करीब 1,000 मेगावाट बढ़ गई है, जबकि कोयले की कमी ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है। केरल अपनी जरूरत की केवल 25 प्रतिशत बिजली ही पैदा करता है और नए बिजली प्रोजेक्ट शुरू करने में देरी ने चुनौती को और बढ़ा दिया है।

इस बहस को और राजनीतिक रंग देते हुए पूर्व बिजली मंत्री एमएम मणि ने आरोप लगाया कि सरकार बाहर से महंगी बिजली खरीदने से पहले संकट को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही हो सकती है, और ऐसे सौदों में निहित स्वार्थ हो सकते हैं। वहीं सोशल मीडिया पर लेफ्ट का मुख्य नैरेटिव सीधा है कि अगर विजयन सत्ता में रहते तो केरल को इस स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता।

सतीशन सरकार के लिए यह मुद्दा अब केवल बिजली क्षेत्र की समस्या नहीं रहा, बल्कि उनकी सरकार के सामने पहला बड़ा सियासी तूफान बन गया है, जिसका विपक्ष पूरी तरह से फायदा उठाने की कोशिश में है।