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गरीबी में गुजरा बचपन, शब्दों के खजाने ने बदली तकदीर; ऐसे चला पूरे देश में शरत चंद्र की कलम का जादू

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नई दिल्ली, 14 सितंबर (आईएएनएस)। शरत चंद्र चट्टोपाध्याय, जिन्होंने अपने शब्दों और रचनाओं से ऐसा जादू बिखेरा कि जिन्हें पढ़ना शुरू करने पर छोड़ा नहीं जा सकता। उनकी रचनाएं भाषा की सीमाओं से परे थीं और उन्हें पूरे भारत में पसंद किया गया। समकालीन समाज से उठाए गए मुद्दे, उनके द्वारा रचे गए जीवंत पात्र और उनकी कहानी कहने का अनोखा अंदाज, इन सबसे पाठक आसानी से जुड़ जाते थे। यही वजह है कि उनकी कई रचनाओं को कई भारतीय भाषाओं में सफल फिल्मों और नाटकों में बदला गया।

‘आवारा मसीहा’ कहलाए गए शरत चंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म 15 सितंबर 1876 को हुगली जिले के देबानंदपुर में हुआ था। उस वक्त किसे पता था कि मोतीलाल चट्टोपाध्याय और भुवन मोहिनी की यह संतान आगे चलकर एक प्रख्यात साहित्यकार बनेगा। वैसे शरत चंद्र चट्टोपाध्याय का बचपन संघर्षों से भरा था। पिता मोतीलाल चट्टोपाध्याय की जिंदगी किसी लहराती नाव जैसी थी। नौकरी की ठोकरों ने परिवार को गरीबी की ओर धकेल दिया था।

शरत चंद्र का बचपन एक पंछी की तरह था, जो इधर-उधर भटकता रहा। उनका बचपन भागलपुर में अपने मामा के घर बीता। परिवार भले गरीबी में था लेकिन उस परिवार में शब्दों से भरा एक खजाना शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के रूप में वक्त के साथ चमकदार हो रहा था।

शरत चंद्र अपनी बेपरवाह जीवनशैली के लिए जाने जाते थे और इसका जिक्र उनके आत्म कथात्मक उपन्यास ‘श्रीकांत’ में भी मिलता है। शरत चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपनी कलम से सिर्फ साहित्य को समृद्ध नहीं किया बल्कि उन मुद्दों को भी उजागर किया, जिन पर बात करना उस दौर में आसान नहीं था। वे खुद रविंद्रनाथ ठाकुर और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की लेखनी से बेहद प्रभावित थे।

‘देवदास’, ‘परिणीता’, ‘चरित्रहीन’ और ‘श्रीकांत’ जैसे उपन्यास लोकप्रिय रहे। ये सिर्फ उपन्यास नहीं बल्कि समाज की सच्चाई को देखाने वाले आइने की तरह हैं, जिससे अक्सर लोग नजरें चुरा लेते हैं। उनके उपन्यास वर्तमान परिस्थितियों से भी ताल्लुक रखते हैं।

उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन की झलक मिलती है। वे शहरों से दूर प्रकृति की शांति में रहने वाले परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी की कहानियां कहते, जो नदियों, पेड़ों और खेतों के बीच बड़े होते हैं। उनके किरदार में पुरुष से अधिक महिलाओं को मजबूती से पेश किया गया है।

कई भारतीय भाषाओं में शरत के उपन्यासों के अनुवाद हुए। शरत चंद्र के कुछ उपन्यासों पर आधारित हिंदी फिल्में भी कई बार बनी हैं। 1974 में इनके उपन्यास ‘चरित्रहीन’ पर आधारित फिल्म उसी नाम से बनी। उसके बाद ‘देवदास’ को आधार बनाकर ‘देवदास’ फिल्म का निर्माण भी तीन बार हुआ।

62 वर्ष की आयु में शरत चंद्र ने दुनिया को अलविदा कह दिया लेकिन उनकी लेखनी आज भी लोगों के दिलों में जीवित है। उन्हें यह गौरव हासिल है कि उनकी रचनाएं हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में आज भी पाठक बड़ी दिलचस्पी के साथ पढ़ते हैं।