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धनबाद का भयावह गजलीटांड़ हादसा: 31 साल बाद भी 26 सितंबर की तारीख मांगती है 64 श्रमिकों की जलसमाधि का हिसाब

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धनबाद, 25 सितंबर (आईएएनएस)। तारीख 26 सितंबर 1995… वह एक गहरी काली रात थी। आसमान से आफत बनकर बरसती बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी। धनबाद की गजलीटांड़ कोलियरी के पास से गुजरने वाली कतरी नदी उफान पर थी। पानी का तेज बहाव अचानक अंडरग्राउंड गजलीटांड़ खदान में घुसने लगा।

गजलीटांड़ कोलियरी की नंबर छह खदान में उस समय 92 मजदूर नीचे काम कर रहे थे। बाहर उनके परिवार आंखों में उम्मीद लिए उनके लौटने का इंतजार कर रहे थे। राहत और बचाव की कोशिशों में 28 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया, लेकिन बाकी मजदूर उतने खुशकिस्मत नहीं निकले। कुछ देर बाद खदान के अंदर से आने वाली आवाजें हमेशा के लिए खामोश हो गईं। उस रात 64 मजदूरों की जिंदगी पानी में समा गई। 31 साल पहले हुआ यह हादसा धनबाद कोयलांचल की उन सबसे भयावह औद्योगिक त्रासदियों में दर्ज है, जिसकी टीस आज भी कम नहीं हुई है।

जलसमाधि लेने वाले श्रमिकों के स्मारक पर हर साल 26 सितंबर को जब उनके परिजन फूल चढ़ाने पहुंचते हैं, तो उनकी नम आंखों में उस काली रात का दर्द फिर से उमड़ पड़ता है। इस हादसे की जांच के लिए गठित आयोग की रिपोर्ट में त्रासदी का पूरा ब्योरा दर्ज है। उस रोज धनबाद और आसपास के झरिया क्षेत्र में करीब 331 से 360 मिलीमीटर बारिश हुई थी, जो सामान्य से करीब तीन गुना अधिक थी। लगातार बारिश से कतरी नदी खतरे के निशान से ऊपर बहने लगी।

झरिया के राजा तालाब का तटबंध टूटने के बाद करीब 275 करोड़ लीटर पानी कतरी नदी में आ गया। शाम करीब 5:15 बजे भारी बारिश के बीच बिजली चली गई। खदान से मजदूरों को बाहर निकालने के लिए मैनुअल विंडिंग सिस्टम का सहारा लिया गया और 28 लोग बाहर निकल सके। बाकी मजदूर नीचे ही रह गए। रात करीब 11 बजे तक उनकी ओर से यांत्रिक संकेत मिलते रहे। इससे पता चल रहा था कि वे जीवित हैं और बाहर निकलने की उम्मीद लगाए हुए हैं, लेकिन रात करीब 12:45 बजे कतरी नदी का पश्चिमी तटबंध टूट गया। पानी तेजी से गजलीटांड़ और आसपास की सैटेलाइट खदानों में घुसने लगा।

कुछ ही समय में भूमिगत रास्ते पूरी तरह पानी से भर गए। गजलीटांड़ में फंसीं 64 जिंदगियां जलराशि में हमेशा के लिए विलीन हो गईं। आसपास की सैटेलाइट खदानों में भी उस रात कई जानें गईं और मरने वालों की संख्या 79 तक पहुंच गई। इसके बाद खदान से पानी निकालने और फंसे मजदूरों की तलाश का लंबा अभियान चला। बीसीसीएल के पास पर्याप्त पंप और संसाधन नहीं थे। बाद में चीन और यूक्रेन के विशेषज्ञों तथा मशीनों की मदद ली गई। कई महीनों तक पानी निकालने की कोशिश जारी रही, लेकिन अधिकांश मजदूरों के शव नहीं मिल सके।

4 मई 1996 को खदान से पांच कंकाल बरामद किए गए। उनकी पहचान खनिकों की टोपी के आधार पर की गई। बाकी मजदूरों के शव कभी नहीं मिल सके। जिन परिवारों ने अपनों को खोया, उनके लिए यह पीड़ा और गहरी थी। न अंतिम दर्शन हुए, न अंतिम विदाई। हादसे की जांच के लिए न्यायमूर्ति एनके मुखर्जी की अध्यक्षता में आयोग गठित किया गया। आयोग ने 26 जून 1998 को रिपोर्ट सौंपी। इसमें हादसे को केवल प्राकृतिक आपदा मानने के बजाय सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर लापरवाही की ओर भी इशारा किया गया।

रिपोर्ट में गजलीटांड़ और अंगरापथरा खदान के बीच सुरक्षा के लिए मौजूद कोयला अवरोधक को हटाए जाने का भी उल्लेख था। हादसे के बाद जवाबदेही और कार्रवाई को लेकर सवाल उठे, लेकिन समय के साथ कई आरोपी सेवानिवृत्त हो गए और कुछ मामलों में अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो सकी।